Saturday, October 26, 2019

मोरल स्टोरी:स्वयं को पुनर्स्थापित करें OK

बाज लगभग 70 वर्ष जीता है ....
परन्तु अपने जीवन के 40वें वर्ष में आते-आते उसे एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना पड़ता है ।
उस अवस्था में उसके शरीर के
3 प्रमुख अंग निष्प्रभावी होने लगते हैं .....
पंजे लम्बे और लचीले हो जाते है, तथा शिकार पर पकड़ बनाने में अक्षम होने लगते हैं ।
चोंच आगे की ओर मुड़ जाती है,
और भोजन में व्यवधान उत्पन्न करने लगती है ।
पंख भारी हो जाते हैं, और सीने से चिपकने के कारण पूर्णरूप से खुल नहीं पाते हैं, उड़ान को सीमित कर देते हैं ।
भोजन ढूँढ़ना, भोजन पकड़ना,
और भोजन खाना .. तीनों प्रक्रियायें अपनी धार खोने लगती हैं ।
उसके पास तीन ही विकल्प बचते हैं....
1. देह त्याग दे,
2. अपनी प्रवृत्ति छोड़ गिद्ध की तरह त्यक्त भोजन पर निर्वाह करे !!
3. या फिर "स्वयं को पुनर्स्थापित करे" !!
आकाश के निर्द्वन्द एकाधिपति के रूप में.
जहाँ पहले दो विकल्प सरल और त्वरित हैं,
अंत में बचता है तीसरा लम्बा और अत्यन्त पीड़ादायी रास्ता ।
बाज चुनता है तीसरा रास्ता ..
और स्वयं को पुनर्स्थापित करता है ।
वह किसी ऊँचे पहाड़ पर जाता है, एकान्त में अपना घोंसला बनाता है ..
और तब स्वयं को पुनर्स्थापित करने की प्रक्रिया प्रारम्भ करता है !!
सबसे पहले वह अपनी चोंच चट्टान पर मार मार कर तोड़ देता है,
चोंच तोड़ने से अधिक पीड़ादायक कुछ भी नहीं है पक्षीराज के लिये !
और वह प्रतीक्षा करता है
चोंच के पुनः उग आने का ।
उसके बाद वह अपने पंजे भी उसी प्रकार तोड़ देता है,
और प्रतीक्षा करता है ..
पंजों के पुनः उग आने का ।
नयी चोंच और पंजे आने के बाद वह अपने भारी पंखों को एक-एक कर नोंच कर निकालता है !
और प्रतीक्षा करता है ..
पंखों के पुनः उग आने का ।
150 दिन की पीड़ा और प्रतीक्षा के बाद ...
मिलती है वही भव्य और ऊँची उड़ान पहले जैसी....
इस पुनर्स्थापना के बाद
वह 30 साल और जीता है ....
ऊर्जा, सम्मान और गरिमा के साथ ।
इसी प्रकार इच्छा, सक्रियता और कल्पना, तीनों निर्बल पड़ने लगते हैं हम इंसानों में भी !
हमें भी भूतकाल में जकड़े
अस्तित्व के भारीपन को त्याग कर कल्पना की उन्मुक्त उड़ाने भरनी होंगी ।
150 दिन न सही.....
60 दिन ही बिताया जाये
स्वयं को पुनर्स्थापित करने में !
जो शरीर और मन से चिपका हुआ है, उसे तोड़ने और
नोंचने में पीड़ा तो होगी ही !!
और फिर जब बाज की तरह उड़ानें भरने को तैयार होंगे ..
इस बार उड़ानें और ऊँची होंगी,
अनुभवी होंगी, अनन्तगामी होंगी ।
हर दिन कुछ चिंतन किया जाए
और आप ही वो व्यक्ति हे
जो खुद को सबसे बेहतर जान सकते है ।
सिर्फ इतना निवेदन है की छोटी-छोटी शुरुवात करें .

Tuesday, October 15, 2019

मोरल स्टोरी: GRATITUDE वैद्द्य जी की कन्या का विवाह

Gratitude:-always be thankful ...what you have...!!

एक पुरानी सी इमारत में  वैद्यजी का मकान था।
पिछले हिस्से में रहते थे और अगले हिस्से में दवाख़ाना खोल रखा था।
उनकी पत्नी की आदत थी कि दवाख़ाना खोलने से पहले उस दिन के लिए आवश्यक सामान एक चिठ्ठी में लिख कर दे देती थी।
वैद्यजी गद्दी पर बैठकर पहले भगवान का नाम लेते फिर वह चिठ्ठी खोलते।
पत्नी ने जो बातें लिखी होतीं, उनके भाव देखते, फिर उनका हिसाब करते।
फिर परमात्मा से प्रार्थना करते कि हे भगवान ! मैं केवल तेरे ही आदेश के अनुसार तेरी भक्ति छोड़कर यहाँ दुनियादारी के चक्कर में आ बैठा हूँ।
वैद्यजी कभी अपने मुँह से किसी रोगी से फ़ीस नहीं माँगते थे।
कोई देता था, कोई नहीं देता था किन्तु एक बात निश्चित थी कि ज्यों ही उस दिन के आवश्यक सामान ख़रीदने योग्य पैसे पूरे हो जाते थे, उसके बाद वह किसी से भी दवा के पैसे नहीं लेते थे चाहे रोगी कितना ही धनवान क्यों न हो।
एक दिन वैद्यजी ने दवाख़ाना खोला।
गद्दी पर बैठकर परमात्मा का स्मरण करके पैसे का हिसाब लगाने के लिए आवश्यक सामान वाली चिट्ठी खोली तो वह चिठ्ठी को एकटक देखते ही रह गए।
एक बार तो उनका मन भटक गया।
उन्हें अपनी आँखों के सामने तारे चमकते हुए नज़र आए किन्तु शीघ्र ही उन्होंने अपनी तंत्रिकाओं पर नियंत्रण पा लिया।
आटे-दाल-चावल आदि के बाद पत्नी ने लिखा था, *"बेटी का विवाह 20 तारीख़ को है, उसके दहेज का सामान।"*
कुछ देर सोचते रहे फिर बाकी चीजों की क़ीमत लिखने के बाद दहेज के सामने लिखा, '' *यह काम परमात्मा का है, परमात्मा जाने।*''
एक-दो रोगी आए थे।
उन्हें वैद्यजी दवाई दे रहे थे।
इसी दौरान एक बड़ी सी कार उनके दवाखाने के सामने आकर रुकी।
वैद्यजी ने कोई खास तवज्जो नहीं दी क्योंकि कई कारों वाले उनके पास आते रहते थे।
दोनों मरीज दवाई लेकर चले गए।
वह सूटेड-बूटेड साहब कार से बाहर निकले और नमस्ते करके बेंच पर बैठ गए।
वैद्यजी ने कहा कि अगर आपको अपने लिए दवा लेनी है तो इधर स्टूल पर आएँ ताकि आपकी नाड़ी देख लूँ और अगर किसी रोगी की दवाई लेकर जाना है तो बीमारी की स्थिति का वर्णन  करें।
वह साहब कहने लगे "वैद्यजी! आपने मुझे पहचाना नहीं।
मेरा नाम कृष्णलाल है लेकिन आप मुझे पहचान भी कैसे सकते हैं?
क्योंकि मैं 15-16 साल बाद आपके दवाखाने पर आया हूँ। आप को पिछली मुलाकात का हाल सुनाता हूँ, फिर आपको सारी बात याद आ जाएगी।
जब मैं पहली बार यहाँ आया था तो मैं खुद नहीं आया था अपितु ईश्वर मुझे आप के पास ले आया था क्योंकि ईश्वर ने मुझ पर कृपा की थी और वह मेरा घर आबाद करना चाहता था।
हुआ इस तरह था कि मैं कार से अपने पैतृक घर जा रहा था। बिल्कुल आपके दवाखाने के सामने हमारी कार पंक्चर हो गई। ड्राईवर कार का पहिया उतार कर पंक्चर लगवाने चला गया।
आपने देखा कि गर्मी में मैं कार के पास खड़ा था तो आप मेरे पास आए और दवाखाने की ओर इशारा किया और कहा कि इधर आकर कुर्सी पर बैठ जाएँ।
अँधा क्या चाहे दो आँखें और कुर्सी पर आकर बैठ गया।
ड्राइवर ने कुछ ज्यादा ही देर लगा दी थी।
एक छोटी-सी बच्ची भी यहाँ आपकी मेज़ के पास खड़ी थी और बार-बार कह रही थी, '' चलो न बाबा, मुझे भूख लगी है।
आप उससे कह रहे थे कि बेटी थोड़ा धीरज धरो, चलते हैं।मैं यह सोच कर कि इतनी देर से आप के पास बैठा था और मेरे ही कारण आप खाना खाने भी नहीं जा रहे थे।
मुझे कोई दवाई खरीद लेनी चाहिए ताकि आप मेरे बैठने का भार महसूस न करें।

मैंने कहा वैद्यजी मैं पिछले 5-6 साल से इंग्लैंड में रहकर कारोबार कर रहा हूँ।
इंग्लैंड जाने से पहले मेरी शादी हो गई थी लेकिन अब तक बच्चे के सुख से वंचित हूँ।
यहाँ भी इलाज कराया और वहाँ इंग्लैंड में भी लेकिन किस्मत ने निराशा के सिवा और कुछ नहीं दिया।"
आपने कहा था, "मेरे भाई! भगवान से निराश न होओ।
याद रखो कि उसके कोष में किसी चीज़ की कोई कमी नहीं है।
आस-औलाद, धन-इज्जत, सुख-दुःख, जीवन-मृत्यु सब कुछ उसी के हाथ में है।
यह किसी वैद्य या डॉक्टर के हाथ में नहीं होता और न ही किसी दवा में  होता है।
जो कुछ होना होता है वह सब भगवान के आदेश से होता है। औलाद देनी है तो उसी ने देनी है।
मुझे याद है आप बातें करते जा रहे थे और साथ-साथ पुड़िया भी बनाते जा रहे थे।
सभी दवा आपने दो भागों में विभाजित कर दो अलग-अलग लिफ़ाफ़ों में डाली थीं और फिर मुझसे पूछकर आप ने एक लिफ़ाफ़े पर मेरा और दूसरे पर मेरी पत्नी का नाम लिखकर दवा उपयोग करने का तरीका बताया था।
मैंने तब बेदिली से वह दवाई ले ली थी क्योंकि मैं सिर्फ कुछ पैसे आप को देना चाहता था।
लेकिन जब दवा लेने के बाद मैंने पैसे पूछे तो आपने कहा था,  बस ठीक है।
मैंने जोर डाला, तो आपने कहा कि आज का खाता बंद हो गया है।
मैंने कहा मुझे आपकी बात समझ नहीं आई।
इसी दौरान वहां एक और आदमी आया उसने हमारी चर्चा सुनकर मुझे बताया कि खाता बंद होने का मतलब यह है कि आज के घरेलू खर्च के लिए जितनी राशि वैद्यजी ने भगवान से माँगी थी वह ईश्वर ने उन्हें  दे दी है।
अधिक पैसे वे नहीं ले सकते।
मैं कुछ हैरान हुआ और कुछ दिल में लज्जित भी कि मेरे  विचार कितने निम्न थे और यह सरलचित्त वैद्य कितना महान है।
मैंने जब घर जा कर पत्नी को औषधि दिखाई और सारी बात बताई तो उसके मुँह से निकला वो इंसान नहीं कोई देवता है और उसकी दी हुई दवा ही हमारे मन की मुराद पूरी करने का कारण बनेंगी।
आज मेरे घर में दो फूल खिले हुए हैं।
हम दोनों पति-पत्नी हर समय आपके लिए प्रार्थना करते रहते हैं।
इतने साल तक कारोबार ने फ़ुरसत ही न दी कि स्वयं आकर आपसे धन्यवाद के दो शब्द ही कह जाता।
इतने बरसों बाद आज भारत आया हूँ और कार केवल यहीं रोकी है।
वैद्यजी हमारा सारा परिवार इंग्लैंड में सेटल हो चुका है।
केवल मेरी एक विधवा बहन अपनी बेटी के साथ भारत में रहती है।
हमारी भान्जी की शादी इस महीने की 21 तारीख को होनी है।
न जाने क्यों जब-जब मैं अपनी भान्जी के भात के लिए कोई सामान खरीदता था तो मेरी आँखों के सामने आपकी वह छोटी-सी बेटी भी आ जाती थी और हर सामान मैं दोहरा खरीद लेता था।
मैं आपके विचारों को जानता था कि संभवतः आप वह सामान न लें किन्तु मुझे लगता था कि मेरी अपनी सगी भान्जी के साथ जो चेहरा मुझे बार-बार दिख रहा है वह भी मेरी भान्जी ही है।
मुझे लगता था कि ईश्वर ने इस भान्जी के विवाह में भी मुझे भात भरने की ज़िम्मेदारी दी है।

वैद्यजी की आँखें आश्चर्य से खुली की खुली रह गईं और बहुत धीमी आवाज़ में बोले, ''कृष्णलाल जी, आप जो कुछ कह रहे हैं मुझे समझ नहीं आ रहा कि ईश्वर की यह क्या माया है।
आप मेरी श्रीमती के हाथ की लिखी हुई यह चिठ्ठी देखिये।" और वैद्यजी ने चिट्ठी खोलकर कृष्णलाल जी को पकड़ा दी।
वहाँ उपस्थित सभी यह देखकर हैरान रह गए कि ''दहेज का सामान'' के सामने लिखा हुआ था '' यह काम परमात्मा का है, परमात्मा जाने।''

काँपती-सी आवाज़ में वैद्यजी बोले, "कृष्णलाल जी, विश्वास कीजिये कि आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि पत्नी ने चिठ्ठी पर आवश्यकता लिखी हो और भगवान ने उसी दिन उसकी व्यवस्था न कर दी हो।
आपकी बातें सुनकर तो लगता है कि भगवान को पता होता है कि किस दिन मेरी श्रीमती क्या लिखने वाली हैं अन्यथा आपसे इतने दिन पहले ही सामान ख़रीदना आरम्भ न करवा दिया होता परमात्मा ने।

वाह भगवान वाह! तू  महान है तू दयावान है।
मैं हैरान हूँ कि वह कैसे अपने रंग दिखाता है।"

वैद्यजी ने आगे कहा, "जब से होश सँभाला है, एक ही पाठ पढ़ा है कि सुबह परमात्मा का आभार करो, शाम को अच्छा दिन गुज़रने का आभार करो, खाते समय उसका आभार करो, सोते समय उसका आभार करो।

शुक्र है मेरे प्रभु
तेरा लाख-लाख ....🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

Monday, October 14, 2019

:हीलिंग: रिदमिक ब्रीथिंग इंट्रोडक्शन ok

 हीलिंग ....... रिदमिक ब्रीथिंग इंट्रोडक्शन। ..

*समस्त मनोकामनाओ को सिद्ध करने,
*परम आनंद को प्राप्त करने,
*उस परम शक्ति को जानने,
*जिससे जुड़ते ही हमारी समस्त समस्याएँ स्वतः ही समाप्त हो जाती है,
*मन के दर्पण से,उस पर चड़ी हुई धूल स्वतः ही साफ हो जाती है
*सब कुछ सु स्पष्ट नज़र आने लगता है,यानि ज्ञान चक्षु,
*मन की आंखे खुल जाती है
 *हमारा तारतम्य उस परम् शक्ति से हो जाता है जहाँ कुछ भी होना असंभव नहीं है
,*इस क्रिया की पहली एवं अहम् सीढी है
 *"प्राण-आ-याम" स्वांस लेने और छोड़ने का एक चक्र,आयाम,स्वाँस लेने की रिदम में मामूली सा परिवर्तन एक नई विधि को जन्म देता है,
जिसका निरंतर प्रयास फिर अभ्यास हमे परम् आनन्द से जोड़ देता,
जिससे जुड़ते ही समस्त भौतिक,दैहिक देविक तापो में कमी आना शुरू हो जाती है व धीरे धीरे समस्त कठिनाइयां समाप्त होने लगती है,मानसिक शांति स्वतः महसूस होने लगती है
उन कठिनाइयों से जूझने व उन पर विजय प्राप्त करने के उपाय स्वयं प्रकट होने लगते है,
इन सब बातों का कदापि यह आशय नही है कि जीवन मे कभी कोई कठिनाई आएगी ही नहीं,
अगर आएगी तो उससे बचने,मुकाबला करने का सामर्थ्य भी स्वतः ही प्राप्त होने लगेगा
,हमे कोई कठिनाई कभी विचलित नही कर पायेगी और हम सम हो जाएंगे।

******मेन्टल पीस फॉर यू******"
जीवन की सारी भागदौड़, संघर्ष का अंतिम लक्ष्य "सुख और शांति" की प्राप्ति ही है,जितनी भी भौतिक वस्तुए,जैसे कार,बँगला ,पैसा,परिवार,पैसा,मानसन्मान,पद प्रतिष्ठा पाने का अंतिम लक्ष्य होता है
बस हमको ख़ुशी मिले,आनंद मिले,मानसिक शांति मिले। 
"इंस्टेंट मेन्टल पीस फॉर यू" मानसिक शान्ति आपके लिए  वह भी तुरंत अभी इसी वक़्त तुरंत!!!!
हमने अपने ४० वर्ष के अनुभव के आधार पर अत्यंत सूक्ष्म विधियों का अनुसन्धान किया है जिससे आपको तुरंत शांति की अनुभूति हो जब हृदय मस्तिष्क व् शरीर शांत व् स्थिर होंगे,उसके बाद किसी भी इच्छा पूर्ण होने में समय नहीं लगता,इन बताई हुई विधियों का नियमित अभ्यास करें और स्वयं महसूस करे.
 यह इंस्टेंट सेशन है, अत; बातो में ज्यादा समय बर्बाद करते हुए प्रयोग एवं अभ्यास करे और अनुभूति करे मानसिक शांति की.. जिसकी खोज हर व्यक्ति को होती है.
 अगर हम पिन पॉइंट करे कि हम "आखिर" चाहते क्या हैं हरेक का एक ही उत्तर होता है हैप्पीनेस!!
 हम यहाँ हम प्रयोग करेंगे,प्रयास करेंगे,अभ्यास करेंगे और पहले सिद्ध करेंगे हैप्पीनेस और उसके पीछे खींची चली आएँगी हेल्थ,वेल्थ,प्रोस्पेरिटी और भी बहुत कुछ जिसकी अपने कभी कल्पना भी नहीं की होगी,.

इंट्रोडक्शन ;
सबसे पहले हम सीखेंगे साँस लेने की सही विधि जिसके सीखते सीखते ही आपको शांति की अनुभूति होना शुरू हो जाएगी।क्योकि जीवन और मृत्यु के बीच सिर्फ एक साँस की डोर है जो हमें साडी अनुभूतियों से जोड़े रखती है यह साँस जीवन की सर्वाधिक आवश्यक क्रिया है लेकिन हम सबसे ज्यादा लापरवाह स्वास के प्रति रहते है और यह मानते है की यह तो सामान्य प्रक्रिया है और जो बिना प्रयास के निरंतर चलती है और चलती रहेगी,जबकि ऐसा नहीं है 

विधि :
सबसे पहले सामन्य गति से दोनों नाक छिद्रो से  स्वास लीजिये और छोड़िये बस महसूस कीजिये की स्वास आ रही है और जा रहे है,

  • अब एक नाक से साँस लेना व् दूसरे से छोड़ना बस इसकी गहराई बढ़ा दीजिये,स्वास क्रिया को मध्यम गति से करे. 
  •  अब बस साँस छोड़ना यानि खाली करना है वह भी मध्यम गति से  
  • मुँह से साँस लेना और मुँह से ही साँस छोड़ना थोड़ा तेज़ गति से। 
  • इसके बाद पुनः सामन्य गति से स्वास लीजिये और छोड़िये। 
  • बस इस प्रक्रिया को कमसे काम 11 दिन तक नियमित एक निर्धारित समय पर निर्धारित स्थान पर करे, 
  • और रोज परिवर्तन महसूस कीजिये हर रोज कुछ न कुछ शांति मिलना शुरू हो जाएगी,पहले से अच्छा लगना शुरू हो जायेगा, 
  • आज के लिए बस इतना ही,............
  •  इसके आगे बढ़ेंगे जब आप नियमित 11 दिन तक इस बेसिक कोर्स पूरा कर लेते है,
  • यानि अब भूमिका  बन गई आगे बढ़ने के लिए।और आप तैयार हो गए आगे बढ़ने के लिए अबतक आपको समझ आ गया होगा  स्वास की इम्पोर्टेन्स। ..