स्वास:प्राण:प्राणायाम:ध्यान:सूत्र-२
पिछले अंक से आगे:क्या इस चक्रव्यूह से निकल पाएंगे...
अब विचार करिये आखिर यह शरीर रोज के कार्यकलाप कैसे सम्पन्न करता है आखिर ये अविरल ऊर्जा मिलती कहाँ से है और कैसे ??
बिजली के उपकरण बिजली से चलते है,
कुछ उपकरण वाष्प शक्ति से चलते है,
यह शरीर रूपी इंजन(मशीन)चलती है "प्राण"वायु शक्ति से..जिसके ऊपर हमारा ध्यान कभी जाता है नहीं हम तो यह माने बैठे है यह तो हमे निरन्त अविरल उपलब्ध रहेगी ही हमलोग इसके लिए"लीस्ट-बोदर्ड" रहते है!!!
जबकि सांस लेने में ज़रा सी भी कठिनाई हो जाये तो एक पल जीना दूभर हो जाता है, है न,
सीधे आई सी यू मे जाना पड़ता है,
कुछ क्षणों में जीवन मृत्यु की जंग शुरू हो जाती है और इस प्रकार का व्यक्ति एक-एक सांस के लिए दुआएं मांगता है उस समय पता चलता है इस "प्राण-वायु" की कीमत,एक एक प्राण सांस के लिए व्यक्ति अपनर जीवन की पूरी दौलत निछावर करने को तैयार रहता है,
एक तरफ हम है कि इसकी कीमत समझने को तैयार ही नहीं है?
आइए अब मूल मुद्दे पर आते है:आखिर ये प्राण वायु है क्या और इसको कैसे संजो कर रखे:
ये एक एक स्वांस जीवन और मृत्यु के बीच की स्वर्ण डोर है,जो स्वांस एक बार बाहर गई तो कोई गारंटी नहीं है कि ये दुबारा अंदर आयेगी ही!!
और अगर नहीं आएगी तो यह शरीर उसी क्षण मृत हो जाएगा,दुनियां दारी के संबंध उसी क्षण विच्छेद हो जाएंगे,उस मृत शरीर को छूने मात्र से जीवित व्यक्ति को भय महसूस होगा और अगर छू भी लिया तो स्वयम की शुद्धि के लिए तुरन्त स्नान आदि करना पड़ेगा यह सच है न..
ये जो "प्राण"स्वांस प्राण वायु जो भी कहे जब इतनी इम्पोर्टेन्ट है फिर हम सब इसके प्रति इतने ल परवाह क्यो है??क्या हम इन "प्राण-वायु"का भोजन व पानी के अनुपात मे उचित संम्मान,प्राथमिकता देते है??कदापि नहीं क्योंकि यह तो हमे बिना प्रयास के उपलब्ध है इस लिए हमारे जीवन मे इसकी कोई कर्मठ इज्जत है ही नहीं?
आईये और बताइये कभी अपने छोटे बालक को सोते हुए देखा है?वो कैसे सांस लेता है,
उसका पेट कितना ऊपर नीचे होता है!!
क्या इतना परिवर्तन आपके हमारे शरीर मे होता है??
कभी देखा नोट किया एक छोटा बच्चा कितना भोजन करता है और पूरे दिन कितना श्रम करता है,1से4-5 वर्ष के बच्चे पूरे दिन में 10-10किलो मीटर तक चल-दौड़ लेते है..चेहरा गुलाब के फूल की तरह सुंदर और तेजमय होता है,आखिर इतनी ऊर्जा कहाँ से आती है?
क्या हम इतने सूक्ष्म आहार के साथ बिना थके इतना
श्रम कर सकते है??शायद नहीं आखिर यह कौनसी शक्ति ऊर्जा बच्चो के पास है और हमारे पास नहीं है,
जैसे जैसे हम बड़े होते है,खुशी,प्यार,मोहब्बत,बेफिक्री दूर होती जाती है और चिंता,फिक्र,शोक,दुःख इत्यादि इत्यादि हमे घेरते जाते है और नतीजा धीरे धीरे स्वास्थ गिरता जाता है बीमारियां दिन पर दिन घेरती जाती है?आखिर क्यों?
यह अकाट्य सत्य "जीवन-मरण"उस परम शक्ति परम् सत्ता के हाथ मे है जिसे हम विभिन्न नामो से अपने धर्म और मज़हब के अनुसार पुकारते है,
लेकिन जब तक इस ग्रह पर वास करे तब तक प्रसन्न चित्त खुश व स्वस्थ व संतुष्ट रहना तो हमारे ही हाथ मे है..!
आज बस इतना ही अगले अंक में चर्चा करेंगे ...सूत्र..3में
पिछले अंक से आगे:क्या इस चक्रव्यूह से निकल पाएंगे...
अब विचार करिये आखिर यह शरीर रोज के कार्यकलाप कैसे सम्पन्न करता है आखिर ये अविरल ऊर्जा मिलती कहाँ से है और कैसे ??
बिजली के उपकरण बिजली से चलते है,
कुछ उपकरण वाष्प शक्ति से चलते है,
यह शरीर रूपी इंजन(मशीन)चलती है "प्राण"वायु शक्ति से..जिसके ऊपर हमारा ध्यान कभी जाता है नहीं हम तो यह माने बैठे है यह तो हमे निरन्त अविरल उपलब्ध रहेगी ही हमलोग इसके लिए"लीस्ट-बोदर्ड" रहते है!!!
जबकि सांस लेने में ज़रा सी भी कठिनाई हो जाये तो एक पल जीना दूभर हो जाता है, है न,
सीधे आई सी यू मे जाना पड़ता है,
कुछ क्षणों में जीवन मृत्यु की जंग शुरू हो जाती है और इस प्रकार का व्यक्ति एक-एक सांस के लिए दुआएं मांगता है उस समय पता चलता है इस "प्राण-वायु" की कीमत,एक एक प्राण सांस के लिए व्यक्ति अपनर जीवन की पूरी दौलत निछावर करने को तैयार रहता है,
एक तरफ हम है कि इसकी कीमत समझने को तैयार ही नहीं है?
आइए अब मूल मुद्दे पर आते है:आखिर ये प्राण वायु है क्या और इसको कैसे संजो कर रखे:
ये एक एक स्वांस जीवन और मृत्यु के बीच की स्वर्ण डोर है,जो स्वांस एक बार बाहर गई तो कोई गारंटी नहीं है कि ये दुबारा अंदर आयेगी ही!!
और अगर नहीं आएगी तो यह शरीर उसी क्षण मृत हो जाएगा,दुनियां दारी के संबंध उसी क्षण विच्छेद हो जाएंगे,उस मृत शरीर को छूने मात्र से जीवित व्यक्ति को भय महसूस होगा और अगर छू भी लिया तो स्वयम की शुद्धि के लिए तुरन्त स्नान आदि करना पड़ेगा यह सच है न..
ये जो "प्राण"स्वांस प्राण वायु जो भी कहे जब इतनी इम्पोर्टेन्ट है फिर हम सब इसके प्रति इतने ल परवाह क्यो है??क्या हम इन "प्राण-वायु"का भोजन व पानी के अनुपात मे उचित संम्मान,प्राथमिकता देते है??कदापि नहीं क्योंकि यह तो हमे बिना प्रयास के उपलब्ध है इस लिए हमारे जीवन मे इसकी कोई कर्मठ इज्जत है ही नहीं?
आईये और बताइये कभी अपने छोटे बालक को सोते हुए देखा है?वो कैसे सांस लेता है,
उसका पेट कितना ऊपर नीचे होता है!!
क्या इतना परिवर्तन आपके हमारे शरीर मे होता है??
कभी देखा नोट किया एक छोटा बच्चा कितना भोजन करता है और पूरे दिन कितना श्रम करता है,1से4-5 वर्ष के बच्चे पूरे दिन में 10-10किलो मीटर तक चल-दौड़ लेते है..चेहरा गुलाब के फूल की तरह सुंदर और तेजमय होता है,आखिर इतनी ऊर्जा कहाँ से आती है?
क्या हम इतने सूक्ष्म आहार के साथ बिना थके इतना
श्रम कर सकते है??शायद नहीं आखिर यह कौनसी शक्ति ऊर्जा बच्चो के पास है और हमारे पास नहीं है,
जैसे जैसे हम बड़े होते है,खुशी,प्यार,मोहब्बत,बेफिक्री दूर होती जाती है और चिंता,फिक्र,शोक,दुःख इत्यादि इत्यादि हमे घेरते जाते है और नतीजा धीरे धीरे स्वास्थ गिरता जाता है बीमारियां दिन पर दिन घेरती जाती है?आखिर क्यों?
यह अकाट्य सत्य "जीवन-मरण"उस परम शक्ति परम् सत्ता के हाथ मे है जिसे हम विभिन्न नामो से अपने धर्म और मज़हब के अनुसार पुकारते है,
लेकिन जब तक इस ग्रह पर वास करे तब तक प्रसन्न चित्त खुश व स्वस्थ व संतुष्ट रहना तो हमारे ही हाथ मे है..!
आज बस इतना ही अगले अंक में चर्चा करेंगे ...सूत्र..3में
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