Friday, January 31, 2020

रिदमिक ब्रीथिंग सूत्र 5 तक

रिदमिक  ब्रीथिंग सूत्र 5
स्वास:प्राण:प्राणायाम:ध्यान सूत्र:5
अत्यधिक:चिंता व मानसिक तनाव ,घबराहट ,अकारण  भयभीत,डरे रहना कहीं ऐसा न हो जाये ,कही वैसा न हो जाये ,ऐसा हो गया तो क्या होगा,वैसा हो गया तो क्या होगा ,जिस परिस्तिथि  का आज कोई अस्तित्व ही नहीं है उससे डरना यहीं से शुरू होता है मानसिक रोग:अवसाद जिसे हम न तो जानते न ही मानते  जकड जाते हैं इसके शिकंजे में ,आज इसी से मुक्त होने की विधियों पर चर्चा कर आपको सिखाते हैं कैसे बचे,
सूत्र -1 सर्व प्रथम  नर्वस  सिस्टम को बैलेंस करना:
*सबसे पहले आराम से किसी शांत जगह बैठ जाये *अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा रखे *कंधो को भी सीधा रखे लेकिन रिलेक्स रखे  *यानि की सीधे बैठ जाये *तन कर बैठ जाये *अपने दोनों हाथो को अपने घटना पर रख ले*अपने आप को रिलेक्स करिये *सर से ले कर पाँव तक महसूस कीजिये कही कोई तनाव तो नहीं है यदि है तो उसे रिलेक्स करने का प्रयास करे* बिना किसी तनाव के अब धीरे धीरे साँस अंदर भरे 1 ,2 ,3 &4 *अब धीरे धीरे साँस छोड़िये 4 ,3 ,2 &1 *सिम्पल कोई परेशानी तो नहीं *ऐसा 21 बार कीजिये साँस लीजिये और छोड़िये और बस रिलेक्स महसूस कीजिये *अपने दिमाग को जितना हो सके शांत रखने का प्रयास करें जबरदस्ती बिलकुल नहीं,*इस पूरी प्रक्रिया को करने में अधिकतम 5  मिनिट लगेंगे *इतना समय तो अपने लिए निकल ही सकते है,*यह प्रक्रिया कही भी कभी भी की जा सकती है ऑफिस में घर में य जहां भी आपको सहूलियत हो ,इसको करने के बाद बताइये कैसा लगा *जब आपने यह प्रक्रिया शुरू की उस समय अपने तनाव,चिंता,फ़िक्र को 1 से लेकर 10 तक अंक से एक अंक चुनिए ,10  यानि अत्यधिक परेशान 1 यानि निश्चिंत कोई टेंशन नहीं,*अब इस प्रक्रिया को पूरा करने के बाद नुम्बे दीजिये कुछ परिवर्तन महसूस हुआ य नहीं यह सब बहुत ही ईमानदारी से कीजिये यही से सुधार  शुरू होगा,* यह क्रिया दिन में तीन बार करनी है,८िस्से क्या क्या लाभ होंगे ये आप स्वयं महसूस करेंगे इस प्रक्रिया को निरंतर 21 दिन तक करना ही है *ब्रेक हो जाये तो पुनः शुरू करे २१ दिन तक लगातार ,
सूत्र-2  तुरंत महसूस करे :ब्लड प्रेशर ,पल्स रेट नार्मल रिलेक्स महसूस करे
*सारी  प्रक्रिया पूर्व के समान *साँस अंदर भरे 1 ,2 ,3 & 4 *साँस छोड़े 10 ,9 ,8 ,7 ,6 ,5 ,4 ,3 ,2 & 1
*महसूस कीजिए परिवर्तन *बस करते रहिये कमसे अकम २१ बार और देखिये परिवर्तन पूर्वानुसार इसको भी नंबर दीजिये क्रिया शुर करते समय और इस क्रिया के समाप्त होने के बाद ,दैनिक जीवन में ,आपसी सम्बन्धो में,निश्चित परिवर्तन होगा ऐसा परिवर्तन होगा जैसी की अपने कभी कल्पना भी नहीं की होगी की इतनी छोटी सी क्रिया से भी कुछ हो सकता है जो हमें संतुष्ट,शांत ,प्रसन्न और भौतिक आवशयकताओ को बिना मांगे पूर्ण कर सके यहाँ से शुरू  होती है मिरेकल,जो कभी सोचा नहीं वह पूर्ण होने लगता हैं बस चाहिए अनुशासन  व् ईमानदारी  व  पूर्ण विश्वास इस प्रक्रिया के प्रति ,
सूत्र-3 :जब भी ज्याद परेशान  हो
इस प्रक्रिया को विभिन्न नामो  से हमारे गुरुओ ने सिखाया है इस क्रिया को भी हम सभी जानते है कुछ लोगो ने तो इसके प्रयोग से गंभीर से गंभीर समस्याओ का निदान पाया है,रोगो से मुक्ति पाई है आइये उसी प्रक्रिया को हम यहाँ सीखते है,करते है
* सब कुछ पूर्व की भाँति
*बस साँस लेनी नहीं है साँस अंदर अपने आप ही आ जाएगी आपको पता भी नहीं चलेगा
*बस आपको साँस नाक छोड़नी है थोड़े प्रेशर के साथ पेट अंदर की और खींचिए और साँस छोड़िये
*20 -20 बार



Saturday, January 11, 2020

मोरल स्टोरी :सत्य व सहज जीवन


सहज,सरलत और सत्य ये तीन ऐसे गुण हैं जिन्हे हरेक व्यक्ति को पालन करने का प्रयास करना चाहिए   सरलता से पृथक होते ही यह जीवन कब में कष्टमय बन जाता है पता ही नहीं चल पाता जीवन हमेशा खुली किताब होना चाहिए जिसमे कुछ भी छुपाने को न हो, जैसे ही हम छुपाना शुरू करते है,वैसे ही दुनिया हमें शक की निगाह से देखना शुरू कर देती है हम सोचते है की लोगो को पता नहीं चलेगा जबकि लोगो को सब पता होता है लेकिन वो जाहिर नहीं करते कि वो सब जानते है,और आपकी मूर्खता,धूर्तता का मज़ा लेते है,साथ ही आपको एक झूठे व् मक्कार व्यक्ति की श्रेणी में डाल देते है, इसलिए ध्यान रखे  सहज व् सत्य जीवन का आधार है
. वैसे  सहजता में जीवन असाधारण होता है  और  सरलता के बगैर सत्य का सानिध्य नहीं मिलता।
मानव को सहज और सरल जीवन व्यतीत करने का अभ्यास करना चाहिए । पद और ज्ञान का दंभ जीवन को जटिलतम बनाता है। सहज और सरल जीवन के माध्यम से, प्रयास के बगैर ही  मंजिल सुगमता से मिल ही  है।

सत्य सहज है और सत्य का यथार्थ से संबंध है, सत्य बोलना कठिन नहीं है। जो वास्तविकता है उसे ही कहना ही सत्य है। सत्य पर चलने के लिए कुछ भी  जोड़ना-घटाना और गुणा-भाग नहीं करना पड़ता।
 झूठ बोलना इसके ठीक विपरीत ही होता है  क्योकि झूंठ में वो कहना व् करना पड़ता है जो  वास्तव में नहीं है, वही कहना पड़ता है जो  वास्तविकता से दूर  है।
संबंध की दीर्घता के लिए  सत्य सरल सेतु  का काम करता है,एक बात और  सत्य को कभी स्मरण नहीं रखना पड़ता क्योकि सत्य हमेशा स्वयं ही  स्मृति में रहता है।
जबकि झूठ को सदा स्मृति पटल पर बनाये रखना बड़ा कठिन होता है और इसी कारण  कभी न कभी कोई न कोई गलती हो ही जाती है जो अकारण हमें शक  के कटघरे में खड़ा कर देती है, झूठ को जितनी बार दोहराते हैं उतनी बार उसका अर्थ व् परिभाषा बदलती जाती  है।  झूठ जटिलताएं उत्पन्न करता है, जो मानसिक तनाव का कारण बनकर सरलता नष्ट करता  है। सरलता के बगैर सत्य का सानिध्य नहीं मिलता। जटिलता छोड़ने पर आनंद धारा फूट पड़ती है।इसलिए सत्य की राह पकड़ो,सरल बनो,सहज बनो जीवन सहज शांति मय बन जायेगा,






Thursday, January 2, 2020

मोरल स्टोरी :महाभारत का एक सार्थक प्रसंग

* महाभारत का एक सार्थक प्रसंग जो अंतर्मन को छूता है .... !!*

महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था. युद्धभूमि में यत्र-तत्र योद्धाओं के फटे वस्त्र, मुकुट, टूटे शस्त्र, टूटे रथों के चक्के, छज्जे आदि बिखरे हुए थे और वायुमण्डल में पसरी हुई थी घोर उदासी .... !
गिद्ध , कुत्ते , सियारों की उदास और डरावनी आवाजों के बीच उस निर्जन हो चुकी उस भूमि में *द्वापर का सबसे महान योद्धा* *"देवव्रत" (भीष्म पितामह)* शरशय्या पर पड़ा सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहा था -- अकेला .... !

तभी उनके कानों में एक परिचित ध्वनि शहद घोलती हुई पहुँची , "प्रणाम पितामह" .... !!

भीष्म के सूख चुके अधरों पर एक मरी हुई मुस्कुराहट तैर उठी ,  बोले , " आओ देवकीनंदन .... !  स्वागत है तुम्हारा .... !!

मैं बहुत देर से तुम्हारा ही स्मरण कर रहा था" .... !!

कृष्ण बोले ,  "क्या कहूँ पितामह ! अब तो यह भी नहीं पूछ सकता कि कैसे हैं आप" .... !

भीष्म चुप रहे , कुछ क्षण बाद बोले," पुत्र युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करा चुके केशव ... ?
उनका ध्यान रखना , परिवार के बुजुर्गों से रिक्त हो चुके राजप्रासाद में उन्हें अब सबसे अधिक तुम्हारी ही आवश्यकता है" .... !

कृष्ण चुप रहे .... !

भीष्म ने पुनः कहा ,  "कुछ पूछूँ केशव .... ?
बड़े अच्छे समय से आये हो .... !
सम्भवतः धरा छोड़ने के पूर्व मेरे अनेक भ्रम समाप्त हो जाँय " .... !!

कृष्ण बोले - कहिये न पितामह ....!

एक बात बताओ प्रभु !  तुम तो ईश्वर हो न .... ?

कृष्ण ने बीच में ही टोका ,  "नहीं पितामह ! मैं ईश्वर नहीं ...  मैं तो आपका पौत्र हूँ पितामह ... ईश्वर नहीं ...."

 भीष्म उस घोर पीड़ा में भी ठठा के हँस पड़े .... !  बोले , " अपने जीवन का स्वयं कभी आकलन नहीं कर पाया कृष्ण , सो नहीं जानता कि अच्छा रहा या बुरा , पर अब तो इस धरा से जा रहा हूँ कन्हैया , अब तो ठगना छोड़ दे रे .... !! "

कृष्ण जाने क्यों भीष्म के पास सरक आये और उनका हाथ पकड़ कर बोले ....  " कहिये पितामह .... !"

भीष्म बोले , "एक बात बताओ कन्हैया !  इस युद्ध में जो हुआ वो ठीक था क्या .... ?"

  "किसकी ओर से पितामह .... ?  पांडवों की ओर से .... ?"

 " कौरवों के कृत्यों पर चर्चा का तो अब कोई अर्थ ही नहीं कन्हैया !  पर क्या पांडवों की ओर से जो हुआ वो सही था .... ?  आचार्य द्रोण का वध , दुर्योधन की जंघा के नीचे प्रहार , दुःशासन की छाती का चीरा जाना , जयद्रथ के साथ हुआ छल , निहत्थे कर्ण का वध , सब ठीक था क्या .... ?  यह सब उचित था क्या .... ?"

 इसका उत्तर मैं कैसे दे सकता हूँ पितामह .... !
इसका उत्तर तो उन्हें देना चाहिए जिन्होंने यह किया ..... !!
उत्तर दें दुर्योधन का वध करने वाले भीम , उत्तर दें कर्ण और जयद्रथ का वध करने वाले अर्जुन .... !!

 मैं तो इस युद्ध में कहीं था ही नहीं पितामह .... !!

 "अभी भी छलना नहीं छोड़ोगे कृष्ण .... ?
 अरे विश्व भले कहता रहे कि महाभारत को अर्जुन और भीम ने जीता है , पर मैं जानता हूँ कन्हैया कि यह तुम्हारी और केवल तुम्हारी विजय है .... !
मैं तो उत्तर तुम्ही से पूछूंगा कृष्ण .... !"

 "तो सुनिए पितामह .... !
कुछ बुरा नहीं हुआ , कुछ अनैतिक नहीं हुआ .... !
 वही हुआ जो हो होना चाहिए .... !"

"यह तुम कह रहे हो केशव .... ?
मर्यादा पुरुषोत्तम राम का अवतार कृष्ण कह रहा है ....?  यह छल तो किसी युग में हमारे सनातन संस्कारों का अंग नहीं रहा, फिर यह उचित कैसे गया ..... ? "

 *"इतिहास से शिक्षा ली जाती है पितामह , पर निर्णय वर्तमान की परिस्थितियों के आधार पर लेना पड़ता है .... !*

 हर युग अपने तर्कों और अपनी आवश्यकता के आधार पर अपना नायक चुनता है .... !!
 राम त्रेता युग के नायक थे , मेरे भाग में द्वापर आया था .... !
हम दोनों का निर्णय एक सा नहीं हो सकता पितामह .... !!"

" नहीं समझ पाया कृष्ण ! तनिक समझाओ तो .... !"

" राम और कृष्ण की परिस्थितियों में बहुत अंतर है पितामह .... !
राम के युग में खलनायक भी ' रावण ' जैसा शिवभक्त होता था .... !!
तब रावण जैसी नकारात्मक शक्ति के परिवार में भी विभीषण जैसे सन्त हुआ करते थे ..... !  तब बाली जैसे खलनायक के परिवार में भी तारा जैसी विदुषी स्त्रियाँ और अंगद जैसे सज्जन पुत्र होते थे .... !  उस युग में खलनायक भी धर्म का ज्ञान रखता था .... !!
 इसलिए राम ने उनके साथ कहीं छल नहीं किया .... ! किंतु मेरे युग के भाग में में कंस , जरासन्ध , दुर्योधन , दुःशासन , शकुनी , जयद्रथ जैसे घोर पापी आये हैं .... !! उनकी समाप्ति के लिए हर छल उचित है पितामह .... ! पाप का अंत आवश्यक है पितामह , वह चाहे जिस विधि से हो .... !!"

 "तो क्या तुम्हारे इन निर्णयों से गलत परम्पराएं नहीं प्रारम्भ होंगी केशव .... ?
क्या भविष्य तुम्हारे इन छलों का अनुशरण नहीं करेगा .... ?
और यदि करेगा तो क्या यह उचित होगा ..... ??"

*" भविष्य तो इससे भी अधिक नकारात्मक आ रहा है पितामह .... !*

*कलियुग में तो इतने से भी काम नहीं चलेगा .... !*

*वहाँ मनुष्य को कृष्ण से भी अधिक कठोर होना होगा ....  नहीं तो धर्म समाप्त हो जाएगा .... !*

*जब क्रूर और अनैतिक शक्तियाँ  सत्य एवं धर्म का समूल नाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों,  तो नैतिकता अर्थहीन हो जाती है पितामह* .... !
तब महत्वपूर्ण होती है विजय , केवल विजय .... !

 *भविष्य को यह सीखना ही होगा पितामह* ..... !!"

"क्या धर्म का भी नाश हो सकता है केशव .... ?
और यदि धर्म का नाश होना ही है , तो क्या मनुष्य इसे रोक सकता है ..... ?"

 *"सबकुछ ईश्वर के भरोसे छोड़ कर बैठना मूर्खता होती है पितामह .... !*

 *ईश्वर स्वयं कुछ नहीं करता ..... !*केवल मार्ग दर्शन करता है*

*सब मनुष्य को ही स्वयं  करना पड़ता है .... !*
आप मुझे भी ईश्वर कहते हैं न .... !
तो बताइए न पितामह , मैंने स्वयं इस युद्घ में कुछ किया क्या ..... ?
सब पांडवों को ही करना पड़ा न .... ?
यही प्रकृति का संविधान है .... !
युद्ध के प्रथम दिन यही तो कहा था मैंने अर्जुन से .... ! यही परम सत्य है ..... !!"

भीष्म अब सन्तुष्ट लग रहे थे .... !
उनकी आँखें धीरे-धीरे बन्द होने लगीं थी .... !
 उन्होंने कहा - चलो कृष्ण ! यह इस धरा पर अंतिम रात्रि है .... कल सम्भवतः चले जाना हो ... अपने इस अभागे भक्त पर कृपा करना कृष्ण .... !"

*कृष्ण ने मन मे ही कुछ कहा और भीष्म को प्रणाम कर लौट चले , पर युद्धभूमि के उस डरावने अंधकार में भविष्य को जीवन का सबसे बड़ा सूत्र मिल चुका था* .... !

*जब अनैतिक और क्रूर शक्तियाँ  सत्य और धर्म का विनाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता का पाठ आत्मघाती होता है ....।।*

*धर्मों रक्षति रक्षितः*