Saturday, December 28, 2019

मोरल स्टोरी : मिलते जुलते रहा करो ....

*मिलते जुलते रहा करो*
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धार वक़्त की बड़ी प्रबल है..
इसमें लय से बहा करो..
जीवन कितना क्षणभंगुर है..
मिलते जुलते रहा करो..

*यादों की भरपूर पोटली..*
*क्षणभर में न बिखर जाए..*
*दोस्तों की अनकही कहानी..*
*तुम भी थोड़ी कहा करो..*

हँसते चेहरों के पीछे भी..
दर्द भरा हो सकता है..
यही सोच मन में रखकर के..
हाथ दोस्त का गहा करो..

*सबके अपने-अपने दुःख हैं..*
*अपनी-अपनी पीड़ा है..*
*यारों के संग थोड़े से दुःख..*
*मिलजुल कर के सहा करो..*

किसका साथ कहाँ तक होगा..
कौन भला कह सकता है..
मिलने के कुछ नए बहाने..
रचते-बुनते रहा करो..

*मिलने जुलने से कुछ यादें..*
*फिर ताज़ा हो उठती हैं..*
*इसीलिए यारों नाहक भी..*
*मिलते जुलते रहा करो..*

  *अपनों को समर्पित*

Tuesday, December 10, 2019

मोरल स्टोरी:अपना सम्मान करो आप मास्टर पीएस हो

**Motivational Story 4 You Only**
         *You are Master's piece*
           ***Respect yourself***

A little boy went to his old grandpa and asked, "What's the value of life?"

 The grandpa gave him one stone and said, "Find out the value of this stone, but don't sell it."

 The boy took the stone to an Orange Seller and asked him what its cost would be.

The Orange Seller saw the shiny stone and said, "You can take 12 oranges and give me the stone."

The boy apologized and said that the grandpa has asked him not to sell it.

He went ahead and found a vegetable seller.

"What could be the value of this stone?" he asked the vegetable seller.

The seller saw the shiny stone and said, "Take one sack of potatoes and give me the stone."

The boy again apologized and said he can't sell it.

Further ahead, he went into a jewellery shop and asked the value of the stone.

The jeweler saw the stone under a lens and said, "I'll give you 1 million for this stone."

When the boy shook his head, the jeweler said, "Alright, alright, take 2 24karat gold necklaces, but give me the stone."

The boy explained that he can't sell the stone.

Further ahead, the boy saw a precious stone's shop and asked the seller the value of this stone.

When the precious stone's seller saw the big ruby, he lay down a red cloth and put the ruby on it.

Then he walked in circles around the ruby and bent down and touched his head in front of the ruby. "From where did you bring this priceless ruby from?" he asked.

"Even if I sell the whole world, and my life, I won't
be able to purchase this priceless stone."

Stunned and confused, the boy returned to the grandpa and told him what had happened.

"Now tell me what is the value of life, grandpa?"

Grandpa said,

"The answers you got from the Orange Seller, the Vegetable Seller, the Jeweler & the Precious Stone's Seller explain the value of our life...

You may be a precious stone, even priceless, but, people will value you based on their financial status, their level of information, their belief in you, their motive behind entertaining you, their ambition, and their risk taking ability.

But don't fear, you will surely find someone who will discern your true value."

*Respect yourself.*

*Don't sell yourself cheap.*

*You are rare, Unique, Original and the only one of ur kind.*

*Your are a masterpiece because u r MASTER'S PIECE.*

*No one can Replace you.*

*Great Life*👍👍 💐💐💐

Wednesday, November 13, 2019

रिदमिक ब्रीथिंग: द्वारा तनाव दूर करें मात्र पांच मिनिट में ---- सूत्र 2

पांच मिनिट में तनाव दूर करे सूत्र एक से आगे   सूत्र- 2

आइये बिना समय गंवाए शुरू करते है-----
सबसे पहले जहाँ भी है वहां आराम से बैठ जाये
शरीर ढीला छोड़ दे कंधे ढीले छोड़ दे पैर सीधे रिलेक्स मुद्रा में
रीढ़ की हड्डी सीढ़ी रखे यानि सीधे बैठ जाये
अब धीरे धीरे सांस अंदर भरे
अब धीरे धीरे साँस बहार छोड़े
४,३,२,१ साँस अंदर भरे
१,२,३,४,साँस बाहर छोड़े
अब अपने पेट पर नाभि के ऊपर हाथ रखें और साँस अंदर भरे  ४,३,२,१,अपने पेट में साँस जा रही है और पेट फूल रहा है इसे महसूस करे यानि आप साँस ढीक तरह से ले रहे है,
अब १,२,३,४ साँस को  थोड़ा प्रेशर के साथ बाहर की ओर छोड़े, पेट को अंदर की ओर  सिकोड़े, महसूस करे सारी  निगेटिविटी,टॉक्सिन ,थकान ,तनाव,घबराहट  इत्यादि बाहर जा रहे है,
इस प्रक्रिया को 11 बार दोहराये,
अब सामन्य गति से साँस ले,अपने हाथो
 को अपने घुटनो पर आराम से रख ले
*अब सबसे पहले ध्यान अपने स्कल यानि सर पर ले जाये और महसूस करे की सर से सारे  तनाव हट रहे  है और सर के ऊपर की स्किन रिलेक्स हो रही,
*इसके बाद अपना पूरा ध्यान माथे के ऊपर ले जाये और महसूस करे कि माथे को पूरी तरह से रिलेक्स स्ट्रेस बिलकुल हटा दे,
* इसके बाद फेस चेहेरे पर अपना ध्यान ले जाये और महसूस करे चेहरा रिलेक्स हो रहा है कोई तनाव नहीं है,
इसके बाद आँखों की पलकों पर ध्यान। ........
इसके बाद गले पर ध्यान
इसके बाद कंधो को रिलेक्स करे
हाथो को रिलेक्स करे
अब अपने सीने को रिलेक्स करे
अब अपनी पीठ को रिलेक्स करे
ान अपने पेट को रिलेक्स करे
अब पेट के अंदर जितने भी ऑर्गन्स है उन्हें रिलेक्स करे
अब अपने हार्ट,लग्स को रिलेक्स कड्रंक रे
अब अपने लोवे एब्डॉमिन को रिलेक्स करे
अपने पैरो को रिलेक्स करे
पैर के पंजो को रिलेक्स करे
अब  मेहसुस करे की आपका पूरा शरीर रिलेक्स हो गया है,
अगर आपको किसी भी अंग म,इ तनाव महसूस हो रहा हो तो अपना ध्यान वहाँ ले जाये और महसूस करे शरीर के सभी अंग,प्रत्यंग,नस नदी हड्डियां,रलेक्स हो गई है और सभी अंग अपने अपने कार्य बड़ी कुशलता से कर रहे है क्योकि अब उनपर कोई तनाव नहीं है,
अब अंत में अपना ध्यान अपने दिमाग पर ले जाये और अपने मस्तिष्क को शांत करे रिलेक्स करे
क्योकि यही है "ड्रंकन-मंकी"इसको कबूं करना सबसे कठिन काम है,बस इसे शांत करना है,
अब आराम से गहरी साँस बिना किसी प्रयास के लीजिये और छोड़िये ध्यान सांसो की आवागमन पर
यह प्रक्रिया निरंतर चले जितनी भी देर तक  सकते है,
इस पूरी प्रक्रिया में कमसे काम ६० मिनिट्स लगने चाहिए,
इसके बढ़ धीरे धीरे अपने शरीर को थोड़ा थोड़ा हिलाये अपनी हथेलियों को धीरे धीरे रगड़े,फिर इन हथेलियों को अपनी आँखों पर लगाए व् चेरे पर लगाए,
अपनी आंखे खोल ले
और महसूस करे फ्रेशनेस,शांति,तनावमुक्ति,प्रसन्नता,इत्यादि इत्यादि।।।।।
धीरे से खड़े हो जाएँ।
अब इसके बाद अपने अनभवों को पुनः महसूस करे,और इन्हे लिख डेल,
अब दिन प्रतिदी प्रगति होगी फर्क महसूस होगा लेकिन जब तक रोज के अनुभव लिखेंगे नहीं तब तक पता कैसे चलेगा की प्रगति हो रही है,
आज बस इतना है..
अगले सत्र में बात करेंगे सेल्फ हीलिंग पर जब तक तनाव मुक्त रहे,सबसे प्रेम करे,क्रोध न करे,शांत रहे,देखिये आपकी हर इच्छा अपने आप प्रकृति पूरी करती है,






















रिदमिक ब्रीथिंग; द्वारा तनाव दूर करे मात्र पांच मिनिट में ---- सूत्र--- 1

तनाव,  चिंता,  फिक्र  आज कल ज़िंदगी का हिस्सा बन गई है,
हर दूसरा  व्यक्ति इन परेशानियों से त्रस्त  है:
आफिस हो घर हो य अन्य कोई स्थान हो तनाव पीछा छोड़ते ही नहीं,
 चिंता,फिक्र,तनाव के कारण मन मे शांति नही रहती और जब मन अशांत रहता है 
तब उसका मुकाबला करते करते अक्सर व्यक्ति तनाव व डिप्रेशन में आ जाता है,
ज़िंदगी में हरेक की ज़िंदगी में ऐसे मुकाम आ जाते है जहाँ अच्छे से अच्छे ,स्ट्रांग विल पॉवर  वाले व्यक्ति भी सब कुछ जानते समझते हुए भी डिप्रेशन,एंगजाइटी,मानसिक तनाव  इत्यादि के शिकार हो ही  जाते हैं और इनका इलाज़ न तो योग न हीं दवाइयाँ,और ना ही ध्यान से कुछ फर्क पड़  पता ,
ब्रेन    दिमाग शान्त ही नहीं होता, विचार रुकते ही नहीं  ध्यान क्या और कैसे लगेगा , अनेको विधियां अपनाने के बाद भी मानसिक शांति   कुछ पलो के लिए भी मिलना मुश्किल हो जाती है 
ऐसे में मात्र  कुछ पल डिसकनेक्ट होने के लिए व्यक्ति अनेक प्रकार के नशे करने लगता है ,और अंततः शांति य डिसकनेक्ट तो हो नहीं पाता हाँ  नशे का आदि ज़रूर  हो जाता है.  
लेकिन  समस्या का समाधान नहीं मिल पा ता, समस्या  दिन प्रतिदिन और गंभीर  होती जाती है स्वास्थ्य समस्या भी घेरने लगती हैं, व्यक्ति और गहरे डिप्रेशन में पहुँच जाता है साथ में वो ये स्वीकार करने को भी तैयार नहीं होता की उसे मानसिक तनाव (रोग) ने धीरे धीरे जकड लिया है यानि की उसे अपनी समस्या का कोई हल नज़र ही नहीं आता और न ही वो स्वीकार करने को तैयार होता है

 कि उसकी समस्या का हल संभव है 
और हल बहुत ही आसान है
इस समस्या के मुकाबले के लिए बस एक मात्र  रास्ता है और 
ऐसे समय में हम सिखाते हैं सिर्फ "ब्रीथिंग टेक्निक"
जिससे कुछ दिन ,कुछ घंटे नहीं 
सिर्फ कुछ ही मिनिटो मे फर्क महसूस होने लगता है
जबकि आज के युग में वैज्ञानिक भी मानते की कुछ समय के ध्यान  से शांति , मानसिक शांति, अच्छा स्वास्थ्यव् जीवन शैली में आमूलचूल परिवर्तन आना शुरू हो जाता  है
 बशर्ते नियमित अभ्यास  करे कम से कम एक से डेढ़ घण्टे तक,लोगो ने इन विधियों को अपनाया है और पूर्ण लाभ पाया है अनेक विद्वानों ने डॉक्टरों की उपस्तिथि में किये गए प्रयोगो ने ध्यान से होने वाले परिवर्तनों को  सिद्ध किया है वास्तव में ध्यान का कोई विकल्प नहीं, जवाब नहीं है,
प्रश्न यह है इस तक पहुंचे कैसे ?
असली समस्या यह है,मस्तिष्क में उठने वाले विचारो को आखिर रोके तो रोके कैसे  ,
इस स्थिथि को प्राप्त करने की पहली सीढ़ी आखिर है क्या

इस विधि का उपयोग आप कभी भी, 
कही भी,किसी भी समय कर सकते है और फर्क तुरंत महसूस कर सकते है, 
मानसिक शांति की अनुभूति तुरंत कर सकते है,
और शांत मन से लिए गए निर्णय हमेशा सही होते है
 तनाव रहित होते है,
आपके सामान्य व्यव्हार में  फर्क आपके आसपास के लोग,मित्र परिवार जन भी महसूस कर सकते है
,इसके बाद आपके चेहरे की चमक तो किसी से छु प नहीं सकती, आपकी खुश मिज़ाज़ी तो किसी से छु प नहीं सकती
***-तो आइये शुरू करते है साँस लेने और छोड़ने की क्रिया को
 देखते है ध्यान से-------
 बस सामान्य गति से साँस लीजिये और छोड़िये बस ध्यान रखिये आप साँस ले रहे है और साँस छोड़ रहे है,
साँस अंदर जा रही है और बाहर  आ रही है
 बस अब धीरे से इस साँस को थोड़ा और गहरा लीजिये और थोड़ ज्याद छोड़िये गति  सामान्य,,
ऑफिस में काम करते में पढ़ते में ,
किसी से बात करते में सिर्फ ध्यान सांसो पर,जो काम कर रहे है करते रहिये ,
बस अब देखिये फर्क,महसूस कीजिये अपनी मानसिक स्तिथि,
यह है ब्रीथिंग एक्सरसाइज़ की पहली सीढ़ी या यो कहिये तैयारी मात्र --
आगे आपको बताएँगे और साथ ले चलेंगे इस आनंद यात्रा पर बस जुड़े रहिये और जीवन के आनंद को महसूस कीजिये जिस पर आपका अधिकार है,
------जारी -----प्राण-आ-याम -----2 पर 





Saturday, October 26, 2019

मोरल स्टोरी:स्वयं को पुनर्स्थापित करें OK

बाज लगभग 70 वर्ष जीता है ....
परन्तु अपने जीवन के 40वें वर्ष में आते-आते उसे एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना पड़ता है ।
उस अवस्था में उसके शरीर के
3 प्रमुख अंग निष्प्रभावी होने लगते हैं .....
पंजे लम्बे और लचीले हो जाते है, तथा शिकार पर पकड़ बनाने में अक्षम होने लगते हैं ।
चोंच आगे की ओर मुड़ जाती है,
और भोजन में व्यवधान उत्पन्न करने लगती है ।
पंख भारी हो जाते हैं, और सीने से चिपकने के कारण पूर्णरूप से खुल नहीं पाते हैं, उड़ान को सीमित कर देते हैं ।
भोजन ढूँढ़ना, भोजन पकड़ना,
और भोजन खाना .. तीनों प्रक्रियायें अपनी धार खोने लगती हैं ।
उसके पास तीन ही विकल्प बचते हैं....
1. देह त्याग दे,
2. अपनी प्रवृत्ति छोड़ गिद्ध की तरह त्यक्त भोजन पर निर्वाह करे !!
3. या फिर "स्वयं को पुनर्स्थापित करे" !!
आकाश के निर्द्वन्द एकाधिपति के रूप में.
जहाँ पहले दो विकल्प सरल और त्वरित हैं,
अंत में बचता है तीसरा लम्बा और अत्यन्त पीड़ादायी रास्ता ।
बाज चुनता है तीसरा रास्ता ..
और स्वयं को पुनर्स्थापित करता है ।
वह किसी ऊँचे पहाड़ पर जाता है, एकान्त में अपना घोंसला बनाता है ..
और तब स्वयं को पुनर्स्थापित करने की प्रक्रिया प्रारम्भ करता है !!
सबसे पहले वह अपनी चोंच चट्टान पर मार मार कर तोड़ देता है,
चोंच तोड़ने से अधिक पीड़ादायक कुछ भी नहीं है पक्षीराज के लिये !
और वह प्रतीक्षा करता है
चोंच के पुनः उग आने का ।
उसके बाद वह अपने पंजे भी उसी प्रकार तोड़ देता है,
और प्रतीक्षा करता है ..
पंजों के पुनः उग आने का ।
नयी चोंच और पंजे आने के बाद वह अपने भारी पंखों को एक-एक कर नोंच कर निकालता है !
और प्रतीक्षा करता है ..
पंखों के पुनः उग आने का ।
150 दिन की पीड़ा और प्रतीक्षा के बाद ...
मिलती है वही भव्य और ऊँची उड़ान पहले जैसी....
इस पुनर्स्थापना के बाद
वह 30 साल और जीता है ....
ऊर्जा, सम्मान और गरिमा के साथ ।
इसी प्रकार इच्छा, सक्रियता और कल्पना, तीनों निर्बल पड़ने लगते हैं हम इंसानों में भी !
हमें भी भूतकाल में जकड़े
अस्तित्व के भारीपन को त्याग कर कल्पना की उन्मुक्त उड़ाने भरनी होंगी ।
150 दिन न सही.....
60 दिन ही बिताया जाये
स्वयं को पुनर्स्थापित करने में !
जो शरीर और मन से चिपका हुआ है, उसे तोड़ने और
नोंचने में पीड़ा तो होगी ही !!
और फिर जब बाज की तरह उड़ानें भरने को तैयार होंगे ..
इस बार उड़ानें और ऊँची होंगी,
अनुभवी होंगी, अनन्तगामी होंगी ।
हर दिन कुछ चिंतन किया जाए
और आप ही वो व्यक्ति हे
जो खुद को सबसे बेहतर जान सकते है ।
सिर्फ इतना निवेदन है की छोटी-छोटी शुरुवात करें .

Tuesday, October 15, 2019

मोरल स्टोरी: GRATITUDE वैद्द्य जी की कन्या का विवाह

Gratitude:-always be thankful ...what you have...!!

एक पुरानी सी इमारत में  वैद्यजी का मकान था।
पिछले हिस्से में रहते थे और अगले हिस्से में दवाख़ाना खोल रखा था।
उनकी पत्नी की आदत थी कि दवाख़ाना खोलने से पहले उस दिन के लिए आवश्यक सामान एक चिठ्ठी में लिख कर दे देती थी।
वैद्यजी गद्दी पर बैठकर पहले भगवान का नाम लेते फिर वह चिठ्ठी खोलते।
पत्नी ने जो बातें लिखी होतीं, उनके भाव देखते, फिर उनका हिसाब करते।
फिर परमात्मा से प्रार्थना करते कि हे भगवान ! मैं केवल तेरे ही आदेश के अनुसार तेरी भक्ति छोड़कर यहाँ दुनियादारी के चक्कर में आ बैठा हूँ।
वैद्यजी कभी अपने मुँह से किसी रोगी से फ़ीस नहीं माँगते थे।
कोई देता था, कोई नहीं देता था किन्तु एक बात निश्चित थी कि ज्यों ही उस दिन के आवश्यक सामान ख़रीदने योग्य पैसे पूरे हो जाते थे, उसके बाद वह किसी से भी दवा के पैसे नहीं लेते थे चाहे रोगी कितना ही धनवान क्यों न हो।
एक दिन वैद्यजी ने दवाख़ाना खोला।
गद्दी पर बैठकर परमात्मा का स्मरण करके पैसे का हिसाब लगाने के लिए आवश्यक सामान वाली चिट्ठी खोली तो वह चिठ्ठी को एकटक देखते ही रह गए।
एक बार तो उनका मन भटक गया।
उन्हें अपनी आँखों के सामने तारे चमकते हुए नज़र आए किन्तु शीघ्र ही उन्होंने अपनी तंत्रिकाओं पर नियंत्रण पा लिया।
आटे-दाल-चावल आदि के बाद पत्नी ने लिखा था, *"बेटी का विवाह 20 तारीख़ को है, उसके दहेज का सामान।"*
कुछ देर सोचते रहे फिर बाकी चीजों की क़ीमत लिखने के बाद दहेज के सामने लिखा, '' *यह काम परमात्मा का है, परमात्मा जाने।*''
एक-दो रोगी आए थे।
उन्हें वैद्यजी दवाई दे रहे थे।
इसी दौरान एक बड़ी सी कार उनके दवाखाने के सामने आकर रुकी।
वैद्यजी ने कोई खास तवज्जो नहीं दी क्योंकि कई कारों वाले उनके पास आते रहते थे।
दोनों मरीज दवाई लेकर चले गए।
वह सूटेड-बूटेड साहब कार से बाहर निकले और नमस्ते करके बेंच पर बैठ गए।
वैद्यजी ने कहा कि अगर आपको अपने लिए दवा लेनी है तो इधर स्टूल पर आएँ ताकि आपकी नाड़ी देख लूँ और अगर किसी रोगी की दवाई लेकर जाना है तो बीमारी की स्थिति का वर्णन  करें।
वह साहब कहने लगे "वैद्यजी! आपने मुझे पहचाना नहीं।
मेरा नाम कृष्णलाल है लेकिन आप मुझे पहचान भी कैसे सकते हैं?
क्योंकि मैं 15-16 साल बाद आपके दवाखाने पर आया हूँ। आप को पिछली मुलाकात का हाल सुनाता हूँ, फिर आपको सारी बात याद आ जाएगी।
जब मैं पहली बार यहाँ आया था तो मैं खुद नहीं आया था अपितु ईश्वर मुझे आप के पास ले आया था क्योंकि ईश्वर ने मुझ पर कृपा की थी और वह मेरा घर आबाद करना चाहता था।
हुआ इस तरह था कि मैं कार से अपने पैतृक घर जा रहा था। बिल्कुल आपके दवाखाने के सामने हमारी कार पंक्चर हो गई। ड्राईवर कार का पहिया उतार कर पंक्चर लगवाने चला गया।
आपने देखा कि गर्मी में मैं कार के पास खड़ा था तो आप मेरे पास आए और दवाखाने की ओर इशारा किया और कहा कि इधर आकर कुर्सी पर बैठ जाएँ।
अँधा क्या चाहे दो आँखें और कुर्सी पर आकर बैठ गया।
ड्राइवर ने कुछ ज्यादा ही देर लगा दी थी।
एक छोटी-सी बच्ची भी यहाँ आपकी मेज़ के पास खड़ी थी और बार-बार कह रही थी, '' चलो न बाबा, मुझे भूख लगी है।
आप उससे कह रहे थे कि बेटी थोड़ा धीरज धरो, चलते हैं।मैं यह सोच कर कि इतनी देर से आप के पास बैठा था और मेरे ही कारण आप खाना खाने भी नहीं जा रहे थे।
मुझे कोई दवाई खरीद लेनी चाहिए ताकि आप मेरे बैठने का भार महसूस न करें।

मैंने कहा वैद्यजी मैं पिछले 5-6 साल से इंग्लैंड में रहकर कारोबार कर रहा हूँ।
इंग्लैंड जाने से पहले मेरी शादी हो गई थी लेकिन अब तक बच्चे के सुख से वंचित हूँ।
यहाँ भी इलाज कराया और वहाँ इंग्लैंड में भी लेकिन किस्मत ने निराशा के सिवा और कुछ नहीं दिया।"
आपने कहा था, "मेरे भाई! भगवान से निराश न होओ।
याद रखो कि उसके कोष में किसी चीज़ की कोई कमी नहीं है।
आस-औलाद, धन-इज्जत, सुख-दुःख, जीवन-मृत्यु सब कुछ उसी के हाथ में है।
यह किसी वैद्य या डॉक्टर के हाथ में नहीं होता और न ही किसी दवा में  होता है।
जो कुछ होना होता है वह सब भगवान के आदेश से होता है। औलाद देनी है तो उसी ने देनी है।
मुझे याद है आप बातें करते जा रहे थे और साथ-साथ पुड़िया भी बनाते जा रहे थे।
सभी दवा आपने दो भागों में विभाजित कर दो अलग-अलग लिफ़ाफ़ों में डाली थीं और फिर मुझसे पूछकर आप ने एक लिफ़ाफ़े पर मेरा और दूसरे पर मेरी पत्नी का नाम लिखकर दवा उपयोग करने का तरीका बताया था।
मैंने तब बेदिली से वह दवाई ले ली थी क्योंकि मैं सिर्फ कुछ पैसे आप को देना चाहता था।
लेकिन जब दवा लेने के बाद मैंने पैसे पूछे तो आपने कहा था,  बस ठीक है।
मैंने जोर डाला, तो आपने कहा कि आज का खाता बंद हो गया है।
मैंने कहा मुझे आपकी बात समझ नहीं आई।
इसी दौरान वहां एक और आदमी आया उसने हमारी चर्चा सुनकर मुझे बताया कि खाता बंद होने का मतलब यह है कि आज के घरेलू खर्च के लिए जितनी राशि वैद्यजी ने भगवान से माँगी थी वह ईश्वर ने उन्हें  दे दी है।
अधिक पैसे वे नहीं ले सकते।
मैं कुछ हैरान हुआ और कुछ दिल में लज्जित भी कि मेरे  विचार कितने निम्न थे और यह सरलचित्त वैद्य कितना महान है।
मैंने जब घर जा कर पत्नी को औषधि दिखाई और सारी बात बताई तो उसके मुँह से निकला वो इंसान नहीं कोई देवता है और उसकी दी हुई दवा ही हमारे मन की मुराद पूरी करने का कारण बनेंगी।
आज मेरे घर में दो फूल खिले हुए हैं।
हम दोनों पति-पत्नी हर समय आपके लिए प्रार्थना करते रहते हैं।
इतने साल तक कारोबार ने फ़ुरसत ही न दी कि स्वयं आकर आपसे धन्यवाद के दो शब्द ही कह जाता।
इतने बरसों बाद आज भारत आया हूँ और कार केवल यहीं रोकी है।
वैद्यजी हमारा सारा परिवार इंग्लैंड में सेटल हो चुका है।
केवल मेरी एक विधवा बहन अपनी बेटी के साथ भारत में रहती है।
हमारी भान्जी की शादी इस महीने की 21 तारीख को होनी है।
न जाने क्यों जब-जब मैं अपनी भान्जी के भात के लिए कोई सामान खरीदता था तो मेरी आँखों के सामने आपकी वह छोटी-सी बेटी भी आ जाती थी और हर सामान मैं दोहरा खरीद लेता था।
मैं आपके विचारों को जानता था कि संभवतः आप वह सामान न लें किन्तु मुझे लगता था कि मेरी अपनी सगी भान्जी के साथ जो चेहरा मुझे बार-बार दिख रहा है वह भी मेरी भान्जी ही है।
मुझे लगता था कि ईश्वर ने इस भान्जी के विवाह में भी मुझे भात भरने की ज़िम्मेदारी दी है।

वैद्यजी की आँखें आश्चर्य से खुली की खुली रह गईं और बहुत धीमी आवाज़ में बोले, ''कृष्णलाल जी, आप जो कुछ कह रहे हैं मुझे समझ नहीं आ रहा कि ईश्वर की यह क्या माया है।
आप मेरी श्रीमती के हाथ की लिखी हुई यह चिठ्ठी देखिये।" और वैद्यजी ने चिट्ठी खोलकर कृष्णलाल जी को पकड़ा दी।
वहाँ उपस्थित सभी यह देखकर हैरान रह गए कि ''दहेज का सामान'' के सामने लिखा हुआ था '' यह काम परमात्मा का है, परमात्मा जाने।''

काँपती-सी आवाज़ में वैद्यजी बोले, "कृष्णलाल जी, विश्वास कीजिये कि आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि पत्नी ने चिठ्ठी पर आवश्यकता लिखी हो और भगवान ने उसी दिन उसकी व्यवस्था न कर दी हो।
आपकी बातें सुनकर तो लगता है कि भगवान को पता होता है कि किस दिन मेरी श्रीमती क्या लिखने वाली हैं अन्यथा आपसे इतने दिन पहले ही सामान ख़रीदना आरम्भ न करवा दिया होता परमात्मा ने।

वाह भगवान वाह! तू  महान है तू दयावान है।
मैं हैरान हूँ कि वह कैसे अपने रंग दिखाता है।"

वैद्यजी ने आगे कहा, "जब से होश सँभाला है, एक ही पाठ पढ़ा है कि सुबह परमात्मा का आभार करो, शाम को अच्छा दिन गुज़रने का आभार करो, खाते समय उसका आभार करो, सोते समय उसका आभार करो।

शुक्र है मेरे प्रभु
तेरा लाख-लाख ....🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

Monday, October 14, 2019

:हीलिंग: रिदमिक ब्रीथिंग इंट्रोडक्शन ok

 हीलिंग ....... रिदमिक ब्रीथिंग इंट्रोडक्शन। ..

*समस्त मनोकामनाओ को सिद्ध करने,
*परम आनंद को प्राप्त करने,
*उस परम शक्ति को जानने,
*जिससे जुड़ते ही हमारी समस्त समस्याएँ स्वतः ही समाप्त हो जाती है,
*मन के दर्पण से,उस पर चड़ी हुई धूल स्वतः ही साफ हो जाती है
*सब कुछ सु स्पष्ट नज़र आने लगता है,यानि ज्ञान चक्षु,
*मन की आंखे खुल जाती है
 *हमारा तारतम्य उस परम् शक्ति से हो जाता है जहाँ कुछ भी होना असंभव नहीं है
,*इस क्रिया की पहली एवं अहम् सीढी है
 *"प्राण-आ-याम" स्वांस लेने और छोड़ने का एक चक्र,आयाम,स्वाँस लेने की रिदम में मामूली सा परिवर्तन एक नई विधि को जन्म देता है,
जिसका निरंतर प्रयास फिर अभ्यास हमे परम् आनन्द से जोड़ देता,
जिससे जुड़ते ही समस्त भौतिक,दैहिक देविक तापो में कमी आना शुरू हो जाती है व धीरे धीरे समस्त कठिनाइयां समाप्त होने लगती है,मानसिक शांति स्वतः महसूस होने लगती है
उन कठिनाइयों से जूझने व उन पर विजय प्राप्त करने के उपाय स्वयं प्रकट होने लगते है,
इन सब बातों का कदापि यह आशय नही है कि जीवन मे कभी कोई कठिनाई आएगी ही नहीं,
अगर आएगी तो उससे बचने,मुकाबला करने का सामर्थ्य भी स्वतः ही प्राप्त होने लगेगा
,हमे कोई कठिनाई कभी विचलित नही कर पायेगी और हम सम हो जाएंगे।

******मेन्टल पीस फॉर यू******"
जीवन की सारी भागदौड़, संघर्ष का अंतिम लक्ष्य "सुख और शांति" की प्राप्ति ही है,जितनी भी भौतिक वस्तुए,जैसे कार,बँगला ,पैसा,परिवार,पैसा,मानसन्मान,पद प्रतिष्ठा पाने का अंतिम लक्ष्य होता है
बस हमको ख़ुशी मिले,आनंद मिले,मानसिक शांति मिले। 
"इंस्टेंट मेन्टल पीस फॉर यू" मानसिक शान्ति आपके लिए  वह भी तुरंत अभी इसी वक़्त तुरंत!!!!
हमने अपने ४० वर्ष के अनुभव के आधार पर अत्यंत सूक्ष्म विधियों का अनुसन्धान किया है जिससे आपको तुरंत शांति की अनुभूति हो जब हृदय मस्तिष्क व् शरीर शांत व् स्थिर होंगे,उसके बाद किसी भी इच्छा पूर्ण होने में समय नहीं लगता,इन बताई हुई विधियों का नियमित अभ्यास करें और स्वयं महसूस करे.
 यह इंस्टेंट सेशन है, अत; बातो में ज्यादा समय बर्बाद करते हुए प्रयोग एवं अभ्यास करे और अनुभूति करे मानसिक शांति की.. जिसकी खोज हर व्यक्ति को होती है.
 अगर हम पिन पॉइंट करे कि हम "आखिर" चाहते क्या हैं हरेक का एक ही उत्तर होता है हैप्पीनेस!!
 हम यहाँ हम प्रयोग करेंगे,प्रयास करेंगे,अभ्यास करेंगे और पहले सिद्ध करेंगे हैप्पीनेस और उसके पीछे खींची चली आएँगी हेल्थ,वेल्थ,प्रोस्पेरिटी और भी बहुत कुछ जिसकी अपने कभी कल्पना भी नहीं की होगी,.

इंट्रोडक्शन ;
सबसे पहले हम सीखेंगे साँस लेने की सही विधि जिसके सीखते सीखते ही आपको शांति की अनुभूति होना शुरू हो जाएगी।क्योकि जीवन और मृत्यु के बीच सिर्फ एक साँस की डोर है जो हमें साडी अनुभूतियों से जोड़े रखती है यह साँस जीवन की सर्वाधिक आवश्यक क्रिया है लेकिन हम सबसे ज्यादा लापरवाह स्वास के प्रति रहते है और यह मानते है की यह तो सामान्य प्रक्रिया है और जो बिना प्रयास के निरंतर चलती है और चलती रहेगी,जबकि ऐसा नहीं है 

विधि :
सबसे पहले सामन्य गति से दोनों नाक छिद्रो से  स्वास लीजिये और छोड़िये बस महसूस कीजिये की स्वास आ रही है और जा रहे है,

  • अब एक नाक से साँस लेना व् दूसरे से छोड़ना बस इसकी गहराई बढ़ा दीजिये,स्वास क्रिया को मध्यम गति से करे. 
  •  अब बस साँस छोड़ना यानि खाली करना है वह भी मध्यम गति से  
  • मुँह से साँस लेना और मुँह से ही साँस छोड़ना थोड़ा तेज़ गति से। 
  • इसके बाद पुनः सामन्य गति से स्वास लीजिये और छोड़िये। 
  • बस इस प्रक्रिया को कमसे काम 11 दिन तक नियमित एक निर्धारित समय पर निर्धारित स्थान पर करे, 
  • और रोज परिवर्तन महसूस कीजिये हर रोज कुछ न कुछ शांति मिलना शुरू हो जाएगी,पहले से अच्छा लगना शुरू हो जायेगा, 
  • आज के लिए बस इतना ही,............
  •  इसके आगे बढ़ेंगे जब आप नियमित 11 दिन तक इस बेसिक कोर्स पूरा कर लेते है,
  • यानि अब भूमिका  बन गई आगे बढ़ने के लिए।और आप तैयार हो गए आगे बढ़ने के लिए अबतक आपको समझ आ गया होगा  स्वास की इम्पोर्टेन्स। ..   


Wednesday, September 25, 2019

मोटिवेशन ----आप जिसके हकदार है क्या वो आपको मिला??


*आपने अपने जीवन में  बहुत मेहनत व् बहुत संघर्ष किया
 लेकिन क्या आपको वो सब मिला जिसके आप हकदार थे ?
*क्या आप भी वह अपनी मंज़िल तक पहुंचते पहुंचते रह गए??
*क्या आप हकदार नहीं वो सब पाने के,जो आपको बहुत पहले मिल जाना चाहिए था?
*इसी कारण क्या  आप भी पीड़ित है फ्रस्टेशन,डिप्रेशन,स्ट्रेस,क्रोध एवं अशांत पारिवारिक जीवन?
*क्या आपके पास मॉडर्न टेक्नोलॉजी,आधुनिक शिक्षा की कमी  है?
दुनियाँ की रेस में अपने को हारा,पिछड़ा  हुआ महसूस करते है?
*दुनियाँ भर की असफलताओं के कारण आप भी हीन भावनाओ से ग्रसित है?
*क्या आप भी अपने क़रीबो से धोखा खाये बैठे है?
*क्या आप भी ये मान बैठे है कि "अब हम से न हो पायेगा"
*क्या आप भी वर्तमान हालत के कारण पिछड़ गये है,अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहे है ?
*क्या आप भी अपनी असफलता के कारण अपने भाग्य को दोषी मानते हैं? भगवान की यही मर्ज़ी?
*क्या आप भी  रास्ता भटक गए है करे तो करे क्या,जाए तो जाए कहाँ?
*दिलकी बात आखिर कहें तो किस से कोई सुनने वाला समझने वाला है ही नहीं?
*क्या आप अपने को बिल्कुल अकेल महसूस करते हो?
*कोई अपना नहीं?क्या आप भी किसी पैर विश्वास नहीं करते?
*दिन रात चिंता फिक्र डिप्रेशन नींद न आना,नशे की आदत,गिरता स्वास्थ्य,भविष्य की चिंता मेरा क्या होगा?
*अनिर्णय,क्या करे,कहाँ से शुरू करे,कैसे करे?मेरे पास तो ये नहीं है मेरे पास तो वो नही है मैं कैसे कर पाऊंगा?
*मुझे मौका कब मिलेगा?
*मेरा चांस कब?
***आइए हम आपको बताएंगे आप के पास क्या है,
आप मे भी वो क्षमता है, आप भी उस सब को पाने के हकदार है, आपके पास जो है वो औरों के पास नही है
***हम आपके हर दुख दर्द से निकालेंगे ,आपकी आंतरिक शक्तियों को जागृत करना सिखाएंगे ?
**हम आपकी हर बात सुनेंगे और विश्वास मानिए किसी को नहीं बताएंगे भी नहीं ,
***हम विकसित करेंगे आपके अंदर आपकी आंतरिक शक्ति,क्षमता,
***अब आपका नंबर है
***Now this is your chance,
***ये सब कुछ बहुत आसानी से उपलब्ध है?
***प्रकृति,यूनिवर्स,में सब कुछ मौजूद है बस आपको उसे पाना सीखना है,
***मेन्टल ब्लॉक खोलिए,
***ये जो सब मान बैठे है ऐसा कुछ नहीं है
***आपका हक है खुश रहने के!!!
***आप डिज़र्व करते है आपको मिलना चाहिए,
***तमाम लोग जो सफल हुए वो क्या आपसे ज्यादा योग्य थे?
***क्या सफल होने के लिए कोई डिग्री आवश्यक है?
***यदि हाँ तो सारे पड़े लिखे लोग क्यो अनपढ़ लोगो के यहां नौकरी कर रहे है??
***जिनको अयोग्य मानते हैं वो सफल क्यो हो गए??
***सफलता के लिए न तो योग्यता न ही कोई स्किल की जरूरत होती!!***दुनियाँ में लोगो के पास इतनी धन दौलत ऐश्वर्य मान संम्मान क्या ये सब सिर्फ  डिग्री य मेहनत से ही कमाया जा सकता है??
यूनिवर्स/प्रकृति/भगवान के यहां सफलता धन दौलत ऐश्वर्य बांटने का को मापदंड नहीं है!!
***यूनिवर्स बस एक शक्ति है जो सबके लिए उपलब्ध है,बस आपको लेना सीखना है जिसे हम सिखाएंगे
जैसे सूर्य की रोशनी सबके लिए बराबर है चाहे गरीब अमीर,ईमानदार बेईमान,चोर साहूकार
ज्ञानी अज्ञानी
***अगर हम अपने दरवाजे खिड़कियां बंद करके रखेगे तो सूर्य की रोशनी कैसे प्रवेश करेगी??
***हम कहते है अंधेरा है कैसे दूर करे?
***दरवाज़े,खिड़कियां तो  हमने ही बंद कर रखे है अपने उधर के ज्ञान/अज्ञान से??
**बस बाहर निकलिये,अपने उधर के ज्ञान से ,मुक्त कीजिये मानसिक बंधनो से?
***जो आप जानते है,मानते है विश्वास करते है वो सही ही हो इसकी क्या गारण्टी इसको सच मानने का अधिकार आपको किसने दे दिया ?विश्वास कीजिये भीड़ का कोई भविष्य नहीं होता ,अपना रास्ता स्वयं चुनिए ,अपने अनुभवों से सीखिए ,
***अपने को खाली कीजिये तुरंत ,नै रौशनी को आने दे,आज अभी तुरंत इसी समय!!!
 ***आपका भाग्य खुल गया है
****अब आपका नम्बर है ..........!!!






स्वास्थ्य ----ह्रदय रोग का सहज इलाज

*हृदय की बीमारी*
*आयुर्वेदिक इलाज !!
हमारे देश भारत मे 3000 साल पहले एक बहुत बड़े ऋषि हुये थे
उनका नाम था *महाऋषि वागवट जी !!*
उन्होने एक पुस्तक लिखी थी
जिसका नाम है *अष्टांग हृदयम!!*
*(Astang  hrudayam)*और इस पुस्तक मे उन्होने ने
 बीमारियो को ठीक करने के लिए *7000* सूत्र लिखे थे !
यह उनमे से ही एक सूत्र है !!
वागवट जी लिखते है कि कभी भी हृदय को घात हो रहा है !
मतलब दिल की नलियों मे blockage होना शुरू हो रहा है !
तो इसका मतलब है कि रकत (blood) में acidity(अम्लता ) बढ़ी हुई है !
अम्लता आप समझते है !
जिसको अँग्रेजी मे कहते है acidity !!
*अम्लता दो तरह की होती है !*
एक होती है *पेट कि अम्लता !*
*और एक होती है रक्त (blood) की अम्लता !!*
आपके पेट मे अम्लता जब बढ़ती है !
तो आप कहेंगे पेट मे जलन सी हो रही है !!
खट्टी खट्टी डकार आ रही है !
मुंह से पानी निकाल रहा है !
और अगर ये अम्लता (acidity)और बढ़ जाये !
तो hyperacidity होगी !
और यही पेट की अम्लता बढ़ते-बढ़ते जब रक्त मे आती है तो रक्त अम्लता  (blood acidity) होती !!
और जब blood मे acidity बढ़ती है तो ये अम्लीय रक्त  (blood) दिल की नलियो मे से निकल नहीं पाता !
और नलिया मे blockage कर देता है !
तभी heart attack होता है !! इसके बिना heart attack नहीं होता !!
और ये आयुर्वेद का सबसे बढ़ा सच है जिसको कोई डाक्टर आपको बताता नहीं !
क्योंकि इसका इलाज सबसे सरल है !!
इलाज क्या है ??
वागबट जी लिखते है कि जब रक्त (blood) मे अम्लता (acidity) बढ़ गई है !
तो आप ऐसी चीजों का उपयोग करो जो क्षारीय है !
आप जानते है दो तरह की चीजे होती है !
*अम्लीय और क्षारीय !!*
*acidic and alkaline*
अब अम्ल और क्षार को मिला दो तो क्या होता है ! ?????
*acid and alkaline को मिला दो तो क्या होता है )?????*
*neutral*
होता है सब जानते है !!
तो वागबट जी लिखते है !
*कि रक्त की अम्लता बढ़ी हुई है तो क्षारीय(alkaline) चीजे खाओ !*
तो रक्त की अम्लता (acidity) neutral हो जाएगी !!!
और रक्त मे अम्लता neutral हो गई !
तो heart attack की जिंदगी मे कभी संभावना ही नहीं !!
ये है सारी कहानी !!
अब आप पूछोगे जी ऐसे कौन सी चीजे है जो क्षारीय है और हम खाये ?????
आपके रसोई घर मे ऐसी बहुत सी चीजे है जो क्षारीय है !
जिनहे आप खाये तो कभी heart attack न आए !
और अगर आ गया है !
तो दुबारा न आए !!
सबसे ज्यादा आपके घर मे क्षारीय चीज है वह है लौकी !!
जिसे दुधी भी कहते है !!
 English मे इसे कहते है bottle gourd !!!
जिसे आप सब्जी के रूप मे खाते है !
इससे ज्यादा कोई क्षारीय चीज ही नहीं है !
तो आप रोज लौकी का रस निकाल-निकाल कर पियो !!
या कच्ची लौकी खायो !!
वागवतट जी कहते है रक्त  की अम्लता कम करने की सबसे  ज्यादा ताकत लौकी मे ही है !
तो आप लौकी के रस का सेवन करे !!
कितना सेवन करे ?????????
रोज 200 से 300 मिलीग्राम पियो !!
कब पिये ??
सुबह खाली पेट (toilet जाने के बाद ) पी सकते है !!
या नाश्ते के आधे घंटे के बाद पी सकते है !!
 इस लौकी के रस को आप और ज्यादा क्षारीय बना सकते है !
इसमे 7 से 10 पत्ते के तुलसी के डाल लो
*तुलसी बहुत क्षारीय है !!*
इसके साथ आप पुदीने से 7 से 10 पत्ते मिला सकते है !
*पुदीना बहुत क्षारीय है !*
इसके साथ आप काला नमक या सेंधा नमक जरूर डाले !
ये भी बहुत क्षारीय है !!
लेकिन याद रखे नमक काला या सेंधा ही डाले !
वो दूसरा आयोडीन युक्त नमक कभी न डाले !!
ये आयोडीन युक्त नमक अम्लीय है !!!!
तो मित्रों आप इस लौकी के जूस का सेवन जरूर करे !!
2 से 3 महीने आपकी सारी heart की blockage ठीक कर देगा !!
21 वे दिन ही आपको बहुत ज्यादा असर दिखना शुरू हो जाएगा !!!
कोई आपरेशन की आपको जरूरत नहीं पड़ेगी !!
घर मे ही हमारे भारत के आयुर्वेद से इसका इलाज हो जाएगा !!
और आपका अनमोल शरीर और लाखो रुपए आपरेशन के बच जाएँगे !!
और पैसे बच जाये ! तो किसी गौशाला मे दान कर दे !
डाक्टर को देने से अच्छा है !किसी गौशाला दान दे !!
हमारी गौ माता बचेगी तो भारत बचेगा !!
आपने पूरी पोस्ट पढ़ी आपका बहुत बहुत धन्यवाद !!
###*- यदि आपको लगता है कि मेने ठीक कहा है तो आप ये जानकारी सभी तक पहुचाए
 *ॐ नमो भगवते वासुदेवाय* 💹
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

मोरल स्टोरी ----मंत्रो से प्राण दाल दिये----

एक बार की बात है 
एक गांव में *मंदिर*
का काम चल रहा था,
मंदिर *आदिवासी* और
*गरीब* लोग बना रहे थे,
एक *आदिवासी बड़ी मूर्ति*
बना रहा था!
कुछ दिन बाद *मंदिर* बनकर
तैयार हो गया,
मंदिर में *पुजारियो* द्वारा
*हवन कार्य मूर्ति स्थापना*
और *मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा*
आदि कार्य सम्पन्न हो गया,
अगले दिन *मन्दिर दर्शन* के
लिए खोल दिया।
वह *मूर्तिकार* जिसने मूर्ति
बनाई वो भी *दर्शन* को
आया था ।
वह ख़ुसी के मारे बिना *चप्पल*
उतारे *मन्दिर में प्रवेश*
कर गया ।
पुजारी उस पर *क्रोधित* हुआ
और कहा -
'मू र्ख तू जाहिल है क्या
*चप्पल* पहनकर मन्दिर
में नही आते
जा चप्पल *बहार* उतार के
आ '!
आदिवासी बोला -' *पुजारी जी*
जब में चप्पल पहनकर मूर्ति
बना रहा था
और चप्पलों से उस पर चढ़
जाता था तब किसी ने मना
नही किया :'!
पुजारी बोला -" बेबकूफ हम
ने अपने मन्त्रो से
*मूर्ति में प्राण* डाल दिए है
समझ गया ",
बेचारा *आदिवासी चुपचाप*
अपने घर चला गया,
कुछ दिन बाद वह दोवारा
मन्दिर गया तो देखा की मन्दिर
में ताला लगा था,
उसको किसी ने बताया
की *पुजारी जी* का *बेटा*
खत्म हो गया है।
यह सुनकर वह *दौड़* कर
*पुजारी के घर* गया ।
वहा देखा सब लोग रो
रहे थे । वह धीरे से पुजारी
के पास जाकर बोला
की आप रो क्यों रहे है,
जैसे अपने मूर्ति में अपने
*मन्त्रो से प्राण डाल दिए*
वेसे ही अपने बेटे में
प्राण डाल दीजिए,
यह सुनकर सब अचंभे से
उसकी तरफ देखने लगे ।
*पुजारी बोला* -'क्या ऐसा
कभी होता है कोई मरा हुआ
दुबारा जीवित होता है
*आदिवासी बोला*-' तो आपने
मन्दिर में जो बात बोली
क्या वो झूठ थी
और *इस प्रश्न का उत्तर*
आज तक नही मिला है?
*अंधविश्वास भगाओ*
*देश बचाओ*

मोरल स्टोरी ---प्रकृति का नियम

प्रकृति  का पहला  नियम:-
यदि खेत में बीज न डालें जाएं
तो कुदरत उसे घास-फूस से भर देती हैं ।
ठीक उसी तरह से  दिमाग में सकारात्मक विचार न भरे जाएँ
तो नकारात्मक विचार दिमाग़ में अपनी जगह बना ही लेती है ।

 प्रकृति का दूसरा नियम:-
जिसके पास जो होता है वह वही बांटता  है।
सुखी "सुख  "बांटता है
दुःखी  "दुःख " बांटता  है
ज्ञानी "ज्ञान" बांटता है
भ्रमित  "भ्रम "बांटता है
भयभीत" भय "बांटता हैं

प्रकृति का तीसरा नियम:-
आपको  जीवन से जो कुछ भी मिलें  उसे पचाना सीखिये---- क्योंकि
भोजन  न पचने  पर रोग बढते है।
पैसा न पचने  पर दिखावा बढता है
बात  न पचने पर चुगली  बढती है ।
प्रशंसा  न पचने पर  अंहकार  बढता है।
निंदा  न पचने पर  दुश्मनी  बढती है ।
राज न पचने पर  खतरा  बढता है ।
दुःख  न पचने पर  निराशा बढती है ।
और सुख न पचने पर  पाप बढता है ।
बात  कडुवी बहुत  है
:पर सत्य  है:

रिदमिक ब्रीथिंग:क्रोध को कैसे काबू करे शांत कैसे रहे सूत्र --3

*स्वास:प्राण:प्राणायाम*सूत्र -5

*!!प्राणवायु का रूपांतरण!!*ट्रांसफॉर्मेशन  ऑफ़ ब्रीथिंग*
प्राणायाम ही एक सूत्र है ,कहते  जापानी लोग सबसे काम क्रोध करते हैं उन्होंने क्रोध से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा  रूपांतरण खुश रहने में, मुस्कुराने में  कर लिया है, इन्होने  शिक्षा को सही मायनो में अपनाया है , कमसे काम एक मानवीय बुराई पर काबू पाने का प्रयास तो किया ,जापान में बच्चो को शुरू  से शिक्षा दी जाती है की जब भी क्रोध आये उस समय गहरी साँस लो ,धीरे धीरे साँस लो, गहरी  साँस   धीरे धीरे लो, "डीप एंड स्लो"
क्रोध एक ऐसी मानवीय प्रक्रिया है जिसे ज्ञान के माध्यम रोका नहीं जा सकता हाँ बस क्रोध आने की सीमा को ऊपर उठाया जा सकता है रोका कदापि नहीं जा सकता,क्योकि यह अपने हाथ की बात भी नहीं है, हाँ कंट्रोल करने का प्रयास अवश्य किया जा सकता है ,क्रोध को काबू करने की शिक्षा चलती रहती परन्तु अंतर शायद ही कुछ पड़ता हो,

क्रोध इतना हाथ में नहीं है, जितना लोग समझते हैं कि क्रोध मत करो। क्रोध इतना वालंटरी नहीं है, नान वालंटरी है। इतना स्वेच्छा में नहीं है, जितना लोग समझते हैं। इसलिए शिक्षा चलती रहती है; कुछ अंतर नहीं पड़ता है.भगवन बुद्ध और श्री कृष्ण ने "प्राण योग"पर बहुत ज़ोर दिया था ,
हम भी यहाँ आती जाती स्वास को ही एक लय  में लेन का प्रयास ही सीखा रहे है, इस आती जाती स्वास का गहरा राज जिसने समझ लिया उसको दुनियां में कुछ समझने को शेष नहीं रह जायेगा। जिसका स्वास सध गया उसके काबू में भूत  और भविष्य आसानी से आ जाता है, मौत का भय समाप्त हो जाता है, जिसको मौत का भय न हो उसे दुनियां  में कोई दूसरी चीज़ भयभीत कर ही नहीं सकती ,'स्वास साढ़े सब सधे "

ध्यान देने वाली बात यह हैं जिसे हम सब ने महसूस किया होगा  क्रोध के समय हमारे स्वास की गति बदल जाती है स्वास की गति बदलते ही हृदय की गति भी बदल जाती है, धड़कन तेज़ हो जाती है, इसके कारण शरीर का प्रत्येक अंग कुछ अलग तरह से व्यव्हार करने लगता है चेहरा लाल हो जाता है रक्त चाप बढ़ जाता है,पसीना आने लगता है, शरीर में विशेष प्रकार का कम्पन्न शुरू हो जाता है,स्वास अस्त-व्यस्त हो जाती है,इसके विपरीत जब हम  शांत एवं प्रसन्न  चित्त  होते है उस समय स्वास की गति पता ही नहीं चलती,स्वास चल भी रही है या नहीं,

पर यह तय है कि हमारे अंदर की मन स्तिथि स्वास से ही जुडी हुई हैं इसका  मतलब स्पस्ट है स्वांस की गति को बदल ते ही मन स्तिथि को बदला जा सकता है, भीतर व् बहार की स्तिथि को नियंत्रण में लेन के लिए स्वास को नियंत्रण में लाना ज्यादा आवश्यक  है,  ,
हमारे विद्वानों ने हज़ारो  ध्यान विधियों का प्रसार प्रचार खूब किया, लोगो ने माना  भी है,फॉलो भी किया बस बहुत कम ही सफल हो पाए, जबकि सारी की सारी  अन्तर  यात्रा, समाधी, ध्यान सब की नीव स्वास पर ही टिकी है,अगर हमने स्वास नियंत्रण य सॉस को लयबद्ध  करना सीख लिया या इस स्वांस प्रक्रिया  का स्वाद चख लिया तो फिर ध्यान व् समाधी में उतरना बिलकुल आसान होता जायेगा, यही डोर हैं अंतर यात्रा की,हमारे शरीर मन बुद्धि आत्मा परमात्मा को एक सूत्र में पिरोने वाली क्रिया ही जानने योग्य है. वो स्वास,प्राण वायु ,स्वास एक ऐसी प्रक्रिया है जो जीवन के आरम्भ से शुरू होती है और अंत तक रहती है,स्वास रुकी तो सारे नाते  सम्बन्ध उसी समय टूट जाते है,
अर्थात स्वास को साधे,
स्वास का रूपांतरण ही प्राणायाम,प्राण योग,ध्यान,समाधि सिद्धि है ,
आइये शुरू करते है
स्वास अंदर भरिये ,गहरी भरिये ,धीरे धीरे भरिये  १,२,३,४,५
रोकिये अंदर १,२,३
बाहार छोड़िये १,२,३,४,५,६,७,८
बाहर रोकिये १,२,3
बस इस छोटी सी प्रक्रिया को १० से लेकर २०  मिनिट  रोजाना निश्चित स्थान व् निश्चित समय पर कीजिये इस क्रम को २१   दिन तक न टूटने दे,फिर देखिये क्या क्या परिवर्तन आप स्वयं महसूस करते है उसे यहाँ बताना आवश्यक नहीं, यह वो स्वाद है जिसे शब्दों के द्वारा नहीं समझाया जा सकता ,इसका स्वाद जो चखेगा वो ही जान पायेगा ,जैसे "पानी" का स्वाद शब्दों में कैसे समझायेंगे बताइये .............
आज के लिए इतना ही.बस आपको करना है निरंतर प्रयास।
अगली चर्च सूत्र 6 में करेंगे


Sunday, August 25, 2019

रिदमिक ब्रीथिंग:डीप ब्रीथिंग के फायदे सूत्र 4

स्वास:प्राण:प्राणायाम:ध्यान:सूत्र-२

पिछले अंक से आगे:क्या इस चक्रव्यूह से निकल पाएंगे...
अब विचार करिये आखिर यह शरीर रोज के कार्यकलाप कैसे सम्पन्न करता है आखिर ये अविरल ऊर्जा मिलती कहाँ से है और कैसे  ??
बिजली के उपकरण बिजली से चलते है,
कुछ उपकरण वाष्प शक्ति से चलते है,
यह शरीर रूपी इंजन(मशीन)चलती है "प्राण"वायु शक्ति से..जिसके ऊपर हमारा ध्यान कभी जाता है नहीं हम तो यह माने बैठे है यह तो हमे निरन्त अविरल उपलब्ध रहेगी ही हमलोग इसके लिए"लीस्ट-बोदर्ड" रहते है!!!
जबकि सांस लेने में ज़रा सी भी कठिनाई हो जाये तो एक पल जीना दूभर हो जाता है, है न,
सीधे आई सी यू मे जाना पड़ता है,
कुछ क्षणों में जीवन मृत्यु की जंग शुरू हो जाती है और इस प्रकार का व्यक्ति एक-एक सांस के लिए दुआएं मांगता है उस समय पता चलता है इस "प्राण-वायु" की कीमत,एक एक प्राण सांस के लिए व्यक्ति अपनर जीवन की पूरी दौलत निछावर करने को तैयार रहता है,
एक तरफ हम है कि इसकी कीमत समझने को तैयार ही नहीं है?
आइए अब मूल मुद्दे पर आते है:आखिर ये प्राण वायु है क्या और इसको कैसे संजो कर रखे:
ये एक एक स्वांस जीवन और मृत्यु के बीच की स्वर्ण डोर है,जो स्वांस एक बार बाहर गई तो कोई गारंटी नहीं है कि ये दुबारा अंदर आयेगी ही!!
और अगर नहीं आएगी तो यह शरीर उसी क्षण मृत हो जाएगा,दुनियां दारी के संबंध उसी क्षण विच्छेद हो जाएंगे,उस मृत शरीर को छूने मात्र से जीवित व्यक्ति को भय महसूस होगा और अगर छू भी लिया तो स्वयम की शुद्धि के लिए तुरन्त स्नान आदि करना पड़ेगा यह सच है न..
ये जो "प्राण"स्वांस प्राण वायु जो भी कहे जब इतनी इम्पोर्टेन्ट है फिर हम सब इसके प्रति इतने ल परवाह क्यो है??क्या हम इन "प्राण-वायु"का भोजन व पानी के अनुपात मे उचित संम्मान,प्राथमिकता देते है??कदापि नहीं क्योंकि यह तो हमे बिना प्रयास के उपलब्ध है इस लिए हमारे जीवन मे इसकी कोई कर्मठ इज्जत है ही नहीं?

आईये और बताइये कभी अपने छोटे बालक को सोते हुए देखा है?वो कैसे सांस लेता है,
उसका पेट कितना ऊपर नीचे होता है!!
क्या इतना परिवर्तन आपके हमारे शरीर मे होता है??
कभी देखा नोट किया एक छोटा बच्चा कितना भोजन करता है और पूरे दिन कितना श्रम करता है,1से4-5 वर्ष के बच्चे पूरे दिन में 10-10किलो मीटर तक चल-दौड़ लेते है..चेहरा गुलाब के फूल की तरह सुंदर और तेजमय होता है,आखिर इतनी ऊर्जा कहाँ से आती है?
क्या हम इतने सूक्ष्म आहार के साथ बिना थके इतना
श्रम कर सकते है??शायद नहीं आखिर यह कौनसी शक्ति ऊर्जा बच्चो के पास है और हमारे पास नहीं है,
जैसे जैसे हम बड़े होते है,खुशी,प्यार,मोहब्बत,बेफिक्री दूर होती जाती है और चिंता,फिक्र,शोक,दुःख इत्यादि इत्यादि हमे घेरते जाते है और नतीजा धीरे धीरे स्वास्थ गिरता जाता है बीमारियां दिन पर दिन घेरती जाती है?आखिर क्यों?
यह अकाट्य सत्य "जीवन-मरण"उस परम शक्ति परम् सत्ता के हाथ मे है जिसे हम विभिन्न नामो से अपने धर्म और मज़हब के अनुसार पुकारते है,
लेकिन जब तक इस ग्रह पर वास करे तब तक प्रसन्न चित्त खुश व स्वस्थ व संतुष्ट रहना तो हमारे ही हाथ मे है..!
आज बस इतना ही अगले अंक में चर्चा करेंगे ...सूत्र..3में

Saturday, August 24, 2019

रिदमिक ब्रीथिंग सूत्र --1

स्वास:प्राण:प्राणायाम:ध्यान:सूत्र-1
हमलोग भोजन के बिना कई दिन तक जीवित रह सकते है,पानी के बिना कुछ दिन जीवित रह सकते है,
परंतु स्वास के बिना कुछ पल व कुछ मिनिट भी जीवित रहना ना मुमकिन है,
हम लोग सबसे ज्यादा ध्यान भोजन पर देते है हज़ारों ग्रंथ लिखे जा चुके है क्या खाएं क्या न खाए,कितना खाये,किस समय खाये,किस भोज्य पदार्थ के गुण अवगुण की इतनी समीक्ष हुई है कि आज हम अनिर्णय की स्तिथि में पहुंच गए किसकी बात माने किसकी बात न माने, आखिर क्या खाएं क्या न खाए?
हमारी इस छोटी सी बात ने आज डायटिशियन व स्वास्थ्य वर्धक भोजन का सबसे बड़ा व्यापार दुनियां भर में विकसित हो गया,और आज भी इस व्यापार की दिन दूनी रात चौगनी वृद्धि हो रही है,
इसी प्रकार स्वच्छ पेयजल का व्यापार भी खूब फल फूल रहा है,विभिन्न प्रकार के फ़िल्टर,एल्कलाइन वाटर,मिनरल वाटर इत्यादि इत्यादि हम भी इस अंधी दौड़ में दौड़ते चले जा रहे है.....जा कहाँ रहे है ये किसी को नहीं मालूम...मार्केटिंग व विज्ञापन का दौर है आज किसी ने मार्केटिंग में डॉक्टर,विशेषज्ञ व व्यपारियो की एक गैंग बन गई है जो दिशा निर्धारित करती है क्या खिलाया जाए और क्या न खिलाया जाए ये एक बहुत बड़ा गोरखधंधा है और हम आम लोग इसमें इतने उलझ गए है,जहां ज्यादा सुना ज्यादा देखा उसी और दौड़ पड़े....दौड़ते दौड़ते जेब भी खाली होने लगी...परंतु नतीजा वही का वही??
जवाब सोचिए:
*क्या आप अब ज्यादा स्वस्थ है?
*क्या आप पहले से ज्यादा उत्साहित है?
*तनाव कम हुआ?
*परिवारिक संबंध सुधरे?
*संतुष्टि मिली?
*इत्यादि इत्यादि..
*इतना ज्यादा भोजन व पानी पर ध्यान दे कर भी बीमारियां बडी है हरेक परिवार का एक निश्चित अंश अस्पतालों,डॉक्टरों व दवाइयों पर खर्च बढ़ता ही जा रहा है,
महानगरों में सिर्फ दो ही व्यापार फलफूल रहे है
*होटल रेस्टॉरेंट,ढाबे,वाटर फिल्टर्स,स्वास्थ्य वर्धक भोजन,ऑर्गेनिक फ़ूड,हेल्थी फ़ूड,सुपर फ़ूड....!
*दूसरे फाइव स्टार मल्टी इस्पेशलिटी हॉस्पिटल्स,दवा कम्पनीयां...
*वर्तमान खान पान बीमारियों को कम कर ही नही सकता...इसीलिए नए नए अस्पताल रोज खुल रहे है!!
*इनमें हम लोगो को पहुंचाने के लिए एक ए एक बढ़िया रेटोरेंट..क्या कभी निकल पाएंगे हम इस चक्र व्यू से...शायद नहीं...