*स्वास:प्राण:प्राणायाम*सूत्र -5
*!!प्राणवायु का रूपांतरण!!*ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ़ ब्रीथिंग*
प्राणायाम ही एक सूत्र है ,कहते जापानी लोग सबसे काम क्रोध करते हैं उन्होंने क्रोध से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा रूपांतरण खुश रहने में, मुस्कुराने में कर लिया है, इन्होने शिक्षा को सही मायनो में अपनाया है , कमसे काम एक मानवीय बुराई पर काबू पाने का प्रयास तो किया ,जापान में बच्चो को शुरू से शिक्षा दी जाती है की जब भी क्रोध आये उस समय गहरी साँस लो ,धीरे धीरे साँस लो, गहरी साँस धीरे धीरे लो, "डीप एंड स्लो"
क्रोध एक ऐसी मानवीय प्रक्रिया है जिसे ज्ञान के माध्यम रोका नहीं जा सकता हाँ बस क्रोध आने की सीमा को ऊपर उठाया जा सकता है रोका कदापि नहीं जा सकता,क्योकि यह अपने हाथ की बात भी नहीं है, हाँ कंट्रोल करने का प्रयास अवश्य किया जा सकता है ,क्रोध को काबू करने की शिक्षा चलती रहती परन्तु अंतर शायद ही कुछ पड़ता हो,
क्रोध इतना हाथ में नहीं है, जितना लोग समझते हैं कि क्रोध मत करो। क्रोध इतना वालंटरी नहीं है, नान वालंटरी है। इतना स्वेच्छा में नहीं है, जितना लोग समझते हैं। इसलिए शिक्षा चलती रहती है; कुछ अंतर नहीं पड़ता है.भगवन बुद्ध और श्री कृष्ण ने "प्राण योग"पर बहुत ज़ोर दिया था ,
हम भी यहाँ आती जाती स्वास को ही एक लय में लेन का प्रयास ही सीखा रहे है, इस आती जाती स्वास का गहरा राज जिसने समझ लिया उसको दुनियां में कुछ समझने को शेष नहीं रह जायेगा। जिसका स्वास सध गया उसके काबू में भूत और भविष्य आसानी से आ जाता है, मौत का भय समाप्त हो जाता है, जिसको मौत का भय न हो उसे दुनियां में कोई दूसरी चीज़ भयभीत कर ही नहीं सकती ,'स्वास साढ़े सब सधे "
ध्यान देने वाली बात यह हैं जिसे हम सब ने महसूस किया होगा क्रोध के समय हमारे स्वास की गति बदल जाती है स्वास की गति बदलते ही हृदय की गति भी बदल जाती है, धड़कन तेज़ हो जाती है, इसके कारण शरीर का प्रत्येक अंग कुछ अलग तरह से व्यव्हार करने लगता है चेहरा लाल हो जाता है रक्त चाप बढ़ जाता है,पसीना आने लगता है, शरीर में विशेष प्रकार का कम्पन्न शुरू हो जाता है,स्वास अस्त-व्यस्त हो जाती है,इसके विपरीत जब हम शांत एवं प्रसन्न चित्त होते है उस समय स्वास की गति पता ही नहीं चलती,स्वास चल भी रही है या नहीं,
पर यह तय है कि हमारे अंदर की मन स्तिथि स्वास से ही जुडी हुई हैं इसका मतलब स्पस्ट है स्वांस की गति को बदल ते ही मन स्तिथि को बदला जा सकता है, भीतर व् बहार की स्तिथि को नियंत्रण में लेन के लिए स्वास को नियंत्रण में लाना ज्यादा आवश्यक है, ,
हमारे विद्वानों ने हज़ारो ध्यान विधियों का प्रसार प्रचार खूब किया, लोगो ने माना भी है,फॉलो भी किया बस बहुत कम ही सफल हो पाए, जबकि सारी की सारी अन्तर यात्रा, समाधी, ध्यान सब की नीव स्वास पर ही टिकी है,अगर हमने स्वास नियंत्रण य सॉस को लयबद्ध करना सीख लिया या इस स्वांस प्रक्रिया का स्वाद चख लिया तो फिर ध्यान व् समाधी में उतरना बिलकुल आसान होता जायेगा, यही डोर हैं अंतर यात्रा की,हमारे शरीर मन बुद्धि आत्मा परमात्मा को एक सूत्र में पिरोने वाली क्रिया ही जानने योग्य है. वो स्वास,प्राण वायु ,स्वास एक ऐसी प्रक्रिया है जो जीवन के आरम्भ से शुरू होती है और अंत तक रहती है,स्वास रुकी तो सारे नाते सम्बन्ध उसी समय टूट जाते है,
अर्थात स्वास को साधे,
स्वास का रूपांतरण ही प्राणायाम,प्राण योग,ध्यान,समाधि सिद्धि है ,
आइये शुरू करते है
स्वास अंदर भरिये ,गहरी भरिये ,धीरे धीरे भरिये १,२,३,४,५
रोकिये अंदर १,२,३
बाहार छोड़िये १,२,३,४,५,६,७,८
बाहर रोकिये १,२,3
बस इस छोटी सी प्रक्रिया को १० से लेकर २० मिनिट रोजाना निश्चित स्थान व् निश्चित समय पर कीजिये इस क्रम को २१ दिन तक न टूटने दे,फिर देखिये क्या क्या परिवर्तन आप स्वयं महसूस करते है उसे यहाँ बताना आवश्यक नहीं, यह वो स्वाद है जिसे शब्दों के द्वारा नहीं समझाया जा सकता ,इसका स्वाद जो चखेगा वो ही जान पायेगा ,जैसे "पानी" का स्वाद शब्दों में कैसे समझायेंगे बताइये .............
आज के लिए इतना ही.बस आपको करना है निरंतर प्रयास।
अगली चर्च सूत्र 6 में करेंगे
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